आत्म-परिचय


आत्म-परिचय 



प्रेमी मोहन नाम के, मथुरा है सुख-धाम।

भाँग, भजन, भोजन, भ्रमण- चार हमारे काम॥

चार हमारे काम, यही भगवान हमारे।

भय-विहीन हैं भवसागर के हम बंजारे॥

आनँदवन में रहे नवल कविता के नेमी।

सखा हमारौ सदा संग है मोहन प्रेमी॥



मथुरिया की मौज


साहित्य के सम्प्रेषण में इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने जो अभूतपूर्व क्रांति की है, उसने मुझ जैसे कलम घसीट पत्रकारों को भी अंतर्जाल के माध्यम से अपने भावोद्‌गार साहित्य-प्रेमी पाठकों तक पहुँचाने के लिए उकसाया है। चालीस वर्षों तक कागजों पर हजारों किलोमीटर लम्बी शब्दाकृतियाँ रचने के बाद भी यह भूख अभी भी बनी हुई है कि मेरी बुद्धि साहित्य-सागर में अंतिम श्वॉस तक अवगाहन करती रहे। मेरे अनन्य प्रेमी और सहयोगी श्री सनेहीराम ने इस चिट्‌ठा को प्रारम्भ करने के लिए मुझे प्रेरित करके हिन्दी पाठकों का कदाचित्‌ भला ही किया है। 

चिट्‌ठा जगत में विभिन्न विषयों पर जो सामग्री इन दिनों पढ़ने में आ रही है उसमें हिन्दी-साहित्य की आदिजननी ब्रजभाषा की उपेक्षा अथवा उसका अभाव साहित्य प्रेमियों को अवश्य ही अखर रहा होगा। मेरा प्रयास होगा कि इस ब्लाग के द्वारा चिट्‌ठा जगत में कुछ नये और क्रांतिकारी विचारों को ब्रजभाषा और खडीबोली के माध्यम से लिखता रहूँ। 

पत्रकारिता और साहित्य-लेखन के इन चालीस वर्षों का अनुभव पाठकों की ज्ञान-पिपासा को किस हद तक तुष्ट कर सकेगा, यह तो इस ब्लाग पर पाठकों की प्रतिक्रियाओं से ही ज्ञात हो सकेगा। 

सर्वप्रथम मथुरा के दैनंदिन लोक-जीवन के शब्द-चित्र प्रस्तुत करते हुए कुछ कुण्डलियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये कुण्डलियाँ मथुरा के स्थानीय सांध्य दैनिक 'छोटी-सी बात' में स्थाई स्तम्भ के अन्तर्गत गतदिनों प्रकाशित होती रही है। समसमायिक घटनाओं पर व्यंग्य और कटाक्ष करते हुए इन कुण्डलियों में यहाँ के लोक-मानस की झलक मिलती है। 'छोटे गुरू' के छद्‌म नाम से लिखी गई इन कुण्डलियों की श्रृंखला को शीर्षक दिया गया है- 'छोटे गुरू के छक्के'। मथुरिया की मौज बनी रही तो आगे भी आपको विभिन्न विषयों पर रोचक और ज्ञानवर्धक सामग्री इस ब्लाग पर पढने को मिलती रहेगी। आपकी प्रतिक्रियाएँ सादर अपेक्षित है।

प्रेमी मथुरिया (प्रेमी बाबा)

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