ब्रज - परिक्रमा

ब्रज-परिक्रमा

(दर्शनीय स्थलों एवं मंदिरों के विवरण सहित)


लेखक: 

प्रेमी मथुरिया
(प्रेमी बाबा)



प्रकाशक :

लोकसेवा प्रतिष्ठान
उषाकिरन प्लाजा, डैम्पीयर नगर, मथुरा
सचल दूरभाष : 
०९७६०८३४६९२  ०९४१५३८३६५५


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प्राक्कथन

ब्रजभूमि इस भूतल पर पूर्ण परात्पर परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण की अवतार और लीला-भूमि है । ‘ब्रज’ शब्द ब्रह्म की जन्मस्थली (ब्रृब्रह्म, जृजन्म) का बोध कराता है– 
ब्रजनं व्याप्तिरित्युत्त्âया व्यापनाद् ब्रज उच्यते ।
गुणातीतं परं  ब्रह्म  व्यापकं ब्रज उच्यते ।।
सम्पूर्ण जगत में व्याप्त ब्रह्म की भाँति यह ब्रज-भूमि भी व्यापक है । ‘वराह-पुराण’ के अनुसार हरिशयनी एकादशी के बाद चार महीने तक पृथ्वी के सभी तीर्थ ब्रज-मण्डल में वास करते हैं, अत: ब्रज-मण्डल की परिक्रमा से पृथ्वी के सभी तीर्थांे की परिक्रमा का फल प्राप्त होता है । यही कारण है कि ब्रजभूमि में विद्यमान स्थलों की अधिकांश परिक्रमाएँ इन्हीं चार महीनों में सम्पन्न होती हैं । 
ब्रज की परिक्रमाओं के इसी माहात्म्य को व्यक्त करने के लिए इस लघु पुस्तिका का प्रकाशन ब्रज के अनुरागी भक्तों की ज्ञान-वृद्धि के लिए किया जा रहा है । यद्यपि अनेक विद्वानों ने इस विषय पर अनेक ग्रन्थों की रचना की है, किन्तु सर्वसाधारण के लिए वे ग्रन्थ सहज सुलभ और सुगम्य नहीं हैं । अत: हमने इस विषय को अपनी सीमित बुद्धि और ज्ञान के अनुसार ब्रज-भक्तों की प्रीत्यर्थ प्रस्तुत किया है ।
कदाचित्, हमारे प्रमाद या अज्ञानवश कोई महत्वपूर्ण तथ्य इस पुस्तिका में उल्लेख करने से रह गया हो, तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं ।
                                                                                                              —प्रेमी बाबा

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सर्वश्रेष्ठ परिक्रमा


पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति य: ।
तस्य वै  पृथिवीजन्यफलं  भवति निश्चितम् ।।

अपहाय  गृहे यो  वै पितरो  तीर्थमाब्रजेत् ।
तस्य पापं तथा  प्रोत्तंâ  हनने च तयोर्यथा ।।

पुत्रस्य  च  महत्तीर्थं  पित्रोश्चरण  पंकजम् ।
अन्य तीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्रापयते पुन: ।।

इतं सन्निहितं तीर्थं  सुलभम् धर्म  साधनम् ।
पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव  तीर्थं गेहे सुशोभनम् ।।
(शिवपुराण, रुद्र संहिता, कु.खं. १९/३९-४२)

जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है । जो माता-पिता को घर पर छोड़कर तीर्थ-यात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान् तीर्थ हैं । अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर ही प्राप्त होते हैं, परन्तु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है । पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुन्दर तीर्थ घर में ही वर्तमान हैं ।



ब्रज-परिक्रमा के नियम-अनुष्ठान

ब्रज-चौरासी कोस परिक्रमा प्रारम्भ करने से पूर्व परिक्रमार्थी- गण विश्रामघाट पर अपने तीर्थ-पुरोहित के हाथ में कलावा (रक्षा) बाँधकर आचार्य रूप में उनका वरण करते हैं तथा परिक्रमा-अवधि में कतिपय नियमों के पालन हेतु स्वयं को प्रतिज्ञाबद्ध करते हैं ।

इन नियमों एवं अनुष्ठानों का शास्त्र-पुराणों में विशद् वर्णन है । ‘वूâर्म-पुराण’ के अनुसार–

१– परिक्रमा-मार्ग में स्थित वृक्ष, लता, गुल्म, गौ, ब्राह्मण आदि तथा मूर्ति, पाषाण, तीर्थ, भगवत्-स्थानादिकों का परित्याग न करें, यथाविधि सम्मान से सबकी पूजा करें । इनका अपमान करने से यात्रा निष्फल होती है ।

२– रात का पहना हुआ वस्त्र, मलिन वस्त्र आदि चर्म तुल्य हैं, इनके धारण करने से धर्म-कर्म का नाश होता है ।

३– ब्रह्मचर्यपूर्वक की गई परिक्रमा श्रेष्ठ फलदायिनी तथा धन-धान्य की वृद्धि करने वाली है ।

४– प्रदक्षिणा (परिक्रमा) के बिना यात्रा कनिष्ठ फल देती है ।

५– शौचादि क्रियाओं से निवृत्त हुए बिना परिक्रमा प्रारम्भ कर देने से वह निष्फल होती है । इससे ब्रह्म-हत्या-दोष लगता है । ऐसा परिक्रमार्थी चांडाल सदृश होता है ।

६– रात्रि में परिक्रमा निषेध है ।

७– परिक्रमा-मार्ग में चलते समय पाँव धीरे-धीरे रखें, अन्यथा जीव-हिंसा होने पर पाप लगता है और यात्रा निष्फल होती है ।

८– परिक्रमा अवधि में उच्छिष्ठ पदार्थ, हड्डी, मांस, तैलादिक वस्तुओं का स्पर्श सर्वथा वर्जनीय है । यदि इनका स्पर्श हो जाय तो पहने हुए वस्त्रों सहित तत्काल स्नान करना चाहिए ।

९– बीमार होने पर अथवा सूतक लगने पर परिक्रमा में यथास्थान ठहर जावें । पश्चात्, आरोग्य अथवा सूतक-निवृत्ति होने पर आगे परिक्रमा करें ।

१०– स्त्री को रजस्वला हो जाने पर पाँच दिन यथास्थान ठहर कर छठे दिन शुद्ध होने पर परिक्रमा करनी चाहिए ।

११– परिक्रमा-काल में इन्द्रिय-निग्रह, पृथ्वी-शयन, तैलभ्यंग एवं क्षौर आदि का निषेध तथा हरि-गुुरु-शास्त्र-कथा-श्रवण आदि नियमों का यथासाध्य पालन करना चाहिये ।
(श्री नारायण भट्ट कृत ‘बृज-भक्ति-विलास’ के आधार पर)

ब्रज-परिक्रमा-मार्ग के तीर्थों पर
दान करने योग्य वस्तुयें

विश्राम घाट : पीताम्बर, उपरना, साड़ी, ओढ़नी, शृङ्गार-सामग्री ।
शिवताल : खड़ाउँ (लकड़ी अथवा चाँदी की )
मधुवन : पीताम्बर, आसन, मृगछाला, कुण्डल, कमण्डल ।
तालवन : हल-मूसल (चाँदी के) ।
कुमुदवन : कमल-पुष्प (चाँदी अथवा सोने के) ।
शान्तनुकुण्ड : दही, चीनी, चावल, मिश्री, मेवा, चन्द्रमा एवं 
    स्वास्तिक (सोने वा चाँदी के)
बहुलावन : सोने का सिंह, चाँदी की गाय, नाव, मुकुट ।
राधाकुण्ड : नीलम की अँगूठी, सोने के वंâगन ।
उद्धवकुण्ड : पीताम्बर, उपरना, कुण्डल ।
कुसुम सरोवर : सोने/चाँदी के पुष्प ।
नारद कुण्ड : वीणा चाँदी की ।
मानसी गंगा : धोती, पीताम्बर, उपरना, गाय, दीपक, और 
            बाती (सोने/चाँदी की)
चन्द्र सरोवर : चाँदी का चन्द्रमा ।
सुरभि कुण्ड : चाँदी का तिलक ।
गोविन्द कुण्ड : गोरोचन, चाँदी की झारी । 
ऐरावत कुण्ड : चाँदी का हाथी । 
अप्सरा कुण्ड : हीरे की अँगूठी । 
नवल कुण्ड : पन्ना की अँगूठी । 
गुलाल-कुण्ड : चाँदी की पिचकारी ।
बिछुआ-कुण्ड : चाँदी के बिछुआ ।
जान-अनजान : युगल प्रतिमा ।
काछना-वन : माखन, मिश्री, चाँदी का कटोरा ।
आदि बद्री : कमण्डल, मुकुट ।
परमदरा : लकुटी, उपरना, धोती ।
अलख-गंगा : उपरना, धोती, गाय । 
भोजन-थारी : चाँदी के थाल-कटोरा । 
कर्ण-कुण्ड : कान की बाली (सोने अथवा चाँदी की) 
सुनेरा : पुखराज की अँगूठी । 
मानिक-शिला : माणिक की अँगूठी । 
चित्र-विचित्र शिला : मेंहदी । 
देह-कुण्ड : देह के लिए स्वर्णाभूषण । 
दोहनी-कुण्ड : चाँदी का कलश (दोहनी ) । 
पामरी : कण्ठहार, कंकण, दुशाला ।
मोती-कुण्ड : मोतियों की माला ।
टेर-कदम्ब : चाँदी की बंशी ।
उद्धव-क्यारी : चाँदी का रथ ।
रावल-कुण्ड : खड़ाउँâ ।
तिलक-कुण्ड : सोने का तिलक ।
करहला : चाँदी की बंशी, मुकुट ।
कोकिला वन : रंग की झोली, चाँदी की पिचकारी ।
शेषशायी : चाँदी के शेष भगवान ।
कामर : कम्बल, कस्तूरी ।
बच्छवन :  चाँदी का बछड़ा ।
चीर-घाट : ओढ़नी, साड़ी, चोली । 
नन्द घाट : चाँदी का शंख, उपरना, आसन । 
भद्रवन : चाँदी का बगुला । 
भाण्डीर वन : चाँदी का सिंहासन, इत्र । 
बेलवन : चाँदी के कमण्डल । 
वृन्दावन : सोने/चाँदी के चँवर । 
केशीघाट : चाँदी का घोड़ा । 
मानसरोवर : दर्पण । 
भतरौड़ : बटलोई, देगची, रसोई के बर्तन ।
लोहवन : कढ़ाही, लोहे के पात्र । 
दाऊजी : हल-मूसल, माखन, मिश्री, पीताम्बर, पटुका ।
महावन : चन्दन-पालना ।
ब्रह्माण्ड घाट : बैंत, चाँदी का ऊखल, केसर, यज्ञोपवीत,पटुका 
चिन्ताहरण : इलाइची, सुपारी,लौंग,धूपबत्ती, कपूर । 
बृहद् वन : छाक-पात्र, दही, कमण्डलु । 

उपरोक्त के अतिरिक्त
– बारह वनों के लिए मेवा-मिष्ठान से भरे १२ कटोरे ।
– चार पर्वतों के लिए चार छत्र ।
– चार वंâटक वनों के लिये चार उपरना, दूध, पेड़ा, चन्दन, केसर, कपूर, धूपबत्ती, रोली, गोरोचन, कस्तूरी, आसन, गोमुखी, माला, यज्ञोपवीत, इत्र, गुलाल, सुपाड़ी, कलावा, लौंग, इलाइची ।



अन्तर्गृही-परिक्रमा

ब्रज-चौरासी कोस की परिक्रमा का नियम-संधान करने के पश्चात् मथुरा की अन्तर्गृही-परिक्रमा करते हैं । सर्वप्रथम ब्रजयात्री विश्रामघाट स्थित आरती-मण्डप, मुकुट-मन्दिर, कुब्जा-कृष्ण, राधा-दामोदर, मुरली-मनोहर, अन्नपूर्णा, गोवर्धननाथ, यमुनाजी-धर्मराज और सत्यनारायणजी वेâ दर्शन करते हैं । विश्राम घाट पर अन्य भी कई देव-स्थान हैं  तथा श्रीमहाप्रभुजी की बैठक भी है, यात्रीगण इन स्थानों पर भी दर्शन करने जाते हैं । तत्पश्चात् गताश्रमनारायण के दर्शन करके सतीघाट स्थित चर्चिका देवी, पिप्पलेश्वर महादेव और योगमाया-मन्दिर के दर्शन करते हैं । प्रयागघाट पर वेणीमाधव के दर्शन करके यात्रीगण श्यामघाट स्थित श्यामजी के दर्शनों का आनन्द लेते हैं । ये अष्टछाप के प्रसिद्ध कीर्तनकार छीतस्वामी के उपास्य देव कहे जाते हैं । रामघाट पर रामेश्वर महादेव के दर्शन करने के पश्चात् रामजीद्वारा मौहल्ले में स्थित प्रसिद्ध श्रीरामजी और अष्टभुजी गोपाल आदि देव-विग्रहों के दर्शन किए जाते हैं ।

यहाँ से गली भीकचन्द में होते हुए यात्री छत्ता बाजार के पश्चिम में स्थित तुलसी-चबूतरा नामक मौहल्ले में प्रवेश करते हैं । यहाँ सात स्वरूपोें और श्रीनाथजी की बैठक के दर्शन हैं । इसके बाद बारी गली स्थित शत्रुघ्नजी एवं वीरभद्रेश्वर के दर्शन करते हैं । आगे चौबच्चा मौहल्ले में विद्यमान पद्मनाभजी के दर्शन करके परिक्रमार्थी नगला पायसा में गोपाल सुन्दरी के दर्शन का आनन्द लेते हैं । इसके पश्चात् मथुरा देवी का दर्शन करते हैं । पुन: खारी कुआँ बाजार में स्थित प्राचीन दीर्घविष्णु भगवान का दर्शन करते हैं । कहा जाता है कि दीर्घविष्णु की प्रतिमा श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बङ्कानाभ के द्वारा स्थापित है ।

मथुरा के कई प्राचीन देवस्थलों पर वर्तमान में यात्रीगण प्राय: अब नहीं जाते हैं, जैसे– मण्डी रामदास में गली गुसार्इंयान स्थित मथुरानाथ, डीग दरवाजा स्थित मथुरानाथ महादेव, मल्लपुरा में श्रीकेशवदेव, वृन्दावन दरवाजे पर बाटी वाली कुञ्ज में एक प्राण दो देह आदि । किन्तु लगभग एक शताब्दी पूर्व इन मन्दिरों को अन्तर्गृही परिक्रमा की परिधि में ही माना जाता था । 

वैसे, अब बल्लभकुलाचार्य गुसार्इंयों के अतिरिक्त अन्य बहुत-से धर्माचार्य भी ब्रज-यात्रा के अनुष्ठान आयोजित करने लगे हैं, इनमें गौड़ीय महात्माओं, निम्बार्काचार्यों, माधवाचार्यों,रामानुजाचार्यों द्वारा अपने-अपने सम्प्रदायों की मान्यता और मर्यादा के अनुसार ब्रज-चौरासी-कोस का परिभ्रमण किया जाता है, जिसके अनुसार परिक्रमा-मार्ग और दर्शनीय स्थलों का क्रम भिन्न-भिन्न हो जाता है ।  

ब्रज-चौरासीकोस-परिक्रमा :
यात्रा-मार्ग के तीर्थ-स्थल


ब्रज की चौरासी कोस परिक्रमा-यात्रा का प्रारम्भ मथुरा में विश्राम घाट पर यात्राध्यक्ष सहित सभी यात्रियों द्वारा अपने-अपने तीर्थ-पुरोहितों के निर्देशन में ‘नियम-ग्रहण’ करने के साथ ही हो जाता है । सर्वप्रथम परिक्रमार्थी मथुरा नगर की अन्त:गृही-परिक्रमा करते हैं । दूसरे दिन मथुरा से प्रस्थान करके नगर के नैऋत्य कोण में ‘शिवताल’ का दर्शन करते हुए ७ कि.मी. दूर ‘मधुवन’ (महोली) में यात्रा का मुकाम होता है । यह स्थान मधु दैत्य का वध-स्थल तथा भक्त ध्रुव की तप:स्थली है । ध्रुव-मन्दिर, कृष्ण-कुण्ड, दाऊजी, कल्याणरायजी व बल्लभाचार्यजी की बैठक यहाँ हैं । दक्षिण में ३ कि.मी. की दूरी पर ‘तालवन’ (तारसी) है– यहाँ बलरामजी ने धेनुक नामक असुर का वध किया था । तालवन से पश्चिम १।। कि.मी. पर ‘कुमुदवन’ या कमोदवन में परिक्रमा कदाचित् दूसरा मुकाम करती है । यहाँ कपिलमुनि, बिहार-कुण्ड और श्रीमहाप्रभुजी की बैठक के दर्शन हैं ।
मधुवन से ‘लवणासुर की गुफा’ और गिरधरपुर में महिष-मर्दिनी का दर्शन करते हुए २१ कि.मी. चलकर यात्रा का मुकाम ‘शान्तनु कुण्ड’ (सतोहा) पर होता है, जहाँ शान्तनु-वन-बिहारी तथा बैठकजी के दर्शन हैं । यहाँ से उत्तर में ‘गनेसरा’ में गंधर्व-कुण्ड, ब्रज-बिहारी तथा गंधर्वेश्वर महादेव का दर्शन है । गनेसरा से वायव्य कोण की दिशा में ‘खेचरी’ लगभग १।। कि.मी. दूर है, जहाँ राक्षसी-पूतना की विशाल देह श्री बालकृष्ण भगवान द्वारा उसका प्राण खींच लेने पर गिरी थी ।

शान्तनु कुण्ड से ९ कि.मी. दूर ‘बहुलावन’ (बाटी गाँव) में परिक्रमा का मुकाम होता है । यहाँ बहुलागाय और सिंह की रार (विवाद) श्रीकृष्ण ने बाँटी (हल करदी) थी, अत: यहाँ ‘रार’ और ‘बाटी’ नामक दो गाँव हैं जो परस्पर ३ कि.मी. के फासले पर हैं । बाटी में बहुलागाय और सिंह तथा श्रीकृष्ण के दर्शन करके, श्रीकृष्ण-कुण्ड, बैठकजी, बलराम-कुण्ड, मानसरोवर, खाडिल-सरोवर, श्रीबलरामजी व श्रीलक्ष्मीनारायण-मन्दिर आदि प्राचीन लीला-स्थलों पर भी यात्रीगण दर्शनार्थ जाते हैं । ‘रार’ में बङ्कानाभ द्वारा स्थापित श्रीबलरामजी तथा बलभद्र-कुण्ड के दर्शन हैं ।

बाटी से ‘बिहारवन’ में श्रीराधाकृष्ण के चरण-दर्शन करते हुए तोष, जिखिनगाँव, दतिहा (दतिया) और माधुरी-कुण्ड होते हुए यात्रीगण ९ कि.मी. चलकर ‘अड़ींग’ में मुुकाम करते हैं । यहाँ वंâस-वध से भयभीत उसके भाई-बन्धु आकर छिप गये थे, पीछा करके श्रीबलरामजी ने उन्हें मार डाला था– ऐसी जनश्रुति है । यहाँ बलभद्र-कुण्ड व मन्दिर, किलोल-कुण्ड, किलोल-बिहारी और सत्यनारायण के प्राचीन मन्दिर हैं । निकट में ही नन्दबाबा द्वारा गोकुल से नन्दगाँव जाते समय का पड़ाव-स्थल जसोदी (जचोंधा) और बसोदी (बसोदा) नामक गाँव हैं ।

अगला मुकाम ‘राधाकुण्ड’ अथवा ‘कुसुम-सरोवर’ पर होता है । मार्ग में मुखराई नामक गाँव में रोहिणी-कुण्ड तथा बिहारीजी का दर्शन है । राधाकुण्ड में श्रीकृष्ण और श्रीराधा द्वारा अपनी मुरली और वंâकण से खोदे गये दो विशाल सरोवर हैं और इनके बीचों-बीच ‘वंâकण’ और बङ्का नामक दो पक्के संयुक्त बने हुए उपकुण्ड भी हैं । गोविन्ददेव, ललितबिहारी, जगन्नाथजी, राधाबल्लभ, बिहारीजी, सीतानाथ, मदनगोपाल, राधामाधव, गदाधर चैतन्य आदि यहाँ के प्रमुख दर्शन हैं । बस्ती के पश्चिमी-भाग में श्रीवुंâजबिहारी-मठ एवं स्वयंप्रकट कालदमन श्रीनाथजी का प्राचीन मन्दिर है । राधाकुण्ड की परिक्रमा में राज-कदम्ब-वृक्ष में भगवान के ‘मुकुट-चिन्ह’ का दर्शन है । राधाकुण्ड-गोवर्धन पक्के मार्ग के किनारे कुसुमसरोवर नामक एक अति विशाल और रमणीक पक्का सरोवर है, जिसका जल कभी सूखता नहीं । सरोवर के पश्चिमी भाग में दाऊजी का मन्दिर और भरतपुर के राजा स्व. सूरजमल का स्मारक अत्यन्त कलात्मक पत्थर की नक्काशी का बेजोड़ प्रतीक है । कुसुम-सरोवर पर श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराधा का शृङ्गार इस सरोवर के कुसुमों से किया गया था । 

यहाँ से पश्चिम में उद्धव-कुण्ड तथा उद्धवबिहारी के दर्शन हैं । पूर्व में सड़क से १ फर्लांग हटकर नारद-कुण्ड, रतन-वेदी और किलोल-कुण्ड हैं । यहीं से दक्षिण में थोड़ी दूर पर ग्वाल-पोखरा है । अगले मुकाम ‘चन्द्र-सरोवर’ (पारासौली) पहँुचने के लिए यात्रीगण गोवर्धन नगर, पालई, जमुनावतौ तथा आन्यौर से गुजरते हैं । गोवर्धन में मानसीगंगा, मुखारबिन्द, मनसादेवी, हरदेवजी, सत्यनारायण, ब्रह्मकुण्ड, गंगेश्वर, चकलेश्वर महादेव, केशवराय, दानीराय और दानघाटी के दर्शन हैं । गोवर्धन-गिरि की सप्तकोसी परिक्रमा का अतिश: माहात्म्य है । जमुनावतौ गाँव में श्रीजमुनाजी प्रवाहित हुआ करती थीं ।

चन्द्रसरोवर के मुकाम पर यात्री दुबेला-कुण्ड, रास-चबूतरा, गोस्वामी गोकुलनाथजी, हरिरायजी व बिट्ठलनाथजी की बैठक, श्रीनाथजी का पूâलघर, जलघर (चन्द्रवूâप) आदि स्थानों के दर्शन करते हैं । पारासौली भक्त सूरदास की साधना-स्थली है । 

पारासौली के बाद ‘जतीपुरा’ में परिक्रमा का सर्वाधिक मुकाम लगभग सात-आठ दिन तक रहता है । गोवर्धन-परिक्रमा-मार्ग में स्थित आन्यौर गाँव में सद्दू पाण्डे के घर में श्रीमहाप्रभुजी की बैठक, गौरीकुण्ड, संकर्षण कुण्ड, बल्देव-मन्दिर, बाजनी-शिला, गन्धर्व-कुण्ड, केसरी-कुण्ड, गोविन्द-कुण्ड तथा वहाँ पर गोस्वामी बिट्ठलनाथजी की बैठक, नागदमन, सिन्दूरी शिला, कजरौटी शिला, विद्याधर-कुण्ड तथा श्रीगिरिराज गोवर्धन के शिलाखण्डों में अनेक प्राकृतिक भगवद्-चिन्ह हैं । आगे चलकर यात्री नवल-अप्सरा-कुण्ड और श्याम-ढाक पहुँचते हैं । श्याम-ढाक में दौंने के आकार के पत्ते वाला प्रसिद्ध वृक्ष है । पैंठा नामक गाँव में पहुँचकर यात्रार्थी उस प्रसिद्ध कदम्ब-वृक्ष का दर्शन करते हैं, जिसके प्राकृतिक रूप से ऐंठे हुए तने का भग्नावशेष अभी भी दर्शनीय है । यहाँ चतुर्भुजराय, नारायण- सरोवर, लक्ष्मी-वूâप, क्षीर-सागर और बलभद्र-कुण्ड के दर्शन हैं । यहाँ से ४ कि.मी. पर बछगाँव नामक वह स्थान है, जहाँ ब्रह्मा ने श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य की परीक्षा के लिए उनकी गायें-बछड़े चुरा लिए थे । बछगाँव में संकर्षण-कुण्ड, अड़वारौ-कुण्ड, कनक-सागर, क्षीरसागर, रामकुण्ड, रावड़ी-कुण्ड आदि के दर्शन हैं । बछगाँव से पूँछरी होते हुए यात्री जतीपुरा पहुँचते हैं ।

जतीपुरा गोवर्धन-गिरि की तलहटी में बसी एक छोटी-सी बस्ती है, किन्तु पुष्टिमार्ग का यह प्रधान केन्द्र है । यहाँ श्रीगिरिराज मुखारबिन्द पर यात्राध्यक्ष गोस्वामियों तथा आचार्यों द्वारा कुनवाड़ा किया जाता है । यहाँ गिरिराज-शिखर पर श्रीनाथजी का भव्य मन्दिर, महाप्रभुजी व गोस्वामी बिट्ठलनाथजी की बैठवेंâ, सात स्वरूपों के हवेली-मन्दिर, गिरधर-कुण्ड, ऐरावत-कुण्ड, सत्यनारायण-मन्दिर, प्रियाजी का चबूतरा आदि अनेक दर्शनीय स्थल हैं । यहीं पर निकट में सूर्य-कुण्ड बिलछूवन तथा वहाँ से २ कि.मी. के अन्तराल पर गाँठौली में श्रीनाथजी की बैठक है । जतीपुरा से वायव्यकोण में ४।। कि.मी. दूर श्रीराधाकृष्ण की होली-लीला का स्थान गुलाल-कुण्ड है । यहाँ श्रीबिट्ठलनाथजी की बैठक है ।

जतीपुरा से चलकर यात्रा का मुकाम राजस्थान के ‘डीग’ नामक नगर में होता है । मार्ग में टोंड़ का घना, नीमगाँव और बहज होते हुए यात्री डीग पहुँचते हैं । लक्ष्मण-मन्दिर, गोवर्धननाथ, साक्षीगोपाल, दाऊजी, रूप-सागर और डीग-सरोवर के अतिरिक्त यहाँ के जल-महल भी दर्शनीय हैं ।

डीग से १२ कि.मी. दूर ‘प्रमोदवन’ (परमदरा) में यात्रा का अगला मुकाम होता है । यहाँ सुदामाकुटी, कृष्णकुण्ड, चरणकुण्ड और साक्षीगोपाल के दर्शन हैं । वृद्धावस्था के कारण नन्द-यशोदा को श्रीकृष्ण ने यहाँ श्रीबद्रीनाथ-तीर्थ का दर्शन कराया था, वह आदिबद्री नामक स्थान परमदरा से ३ कि.मी. दूर गुहाना नामक गाँव में है । यहाँ से आगे बूढ़े बद्री, गौरी कुण्ड, सौगन्धी शिला, सेहू गाँव में नैन-सरोवर और सेतु-कन्दरा हैं । सेहू के निकट आनन्दवन और आनन्दपर्वत है, जहाँ गोस्वामी देवकीनन्दनजी महाराज की बैठक है । आगे इन्दरौली गाँव में इन्द्रकुण्ड तथा कनवारौ गाँव में पनिहारी कुण्ड हैं । आगे केदारनाथ, चरण-पहाड़ी और गया-कुण्ड होते हुए यात्रा ‘कामवन’ में मुकाम करती है ।

नित्य-वृन्दावन की मान्यता प्राप्त महत्तम तीर्थ-क्षेत्र कामवन भी राजस्थान में ही स्थित है । यहाँ श्रीमहाप्रभु, श्रीबिट्ठलनाथजी, श्रीगोकुलनाथजी और श्रीगोविन्दलालजी की बैठकें व गोकुल-चन्द्रमाजी, मदनमोहनजी आदि के दर्शन हैं । गोपीनाथ, गोविन्ददेव, सत्यनारायण, नृसिंहदेव, श्वेत बाराह, नील बाराह, बल्देवजी, चतुर्भुजजी, दाऊजी, मदनगोपाल, कामवन-बिहारी, विमलादेवी, विमलबिहारी, मुरलीमनोहर, गोपालजी, बिहारीजी, राधामोहनजी, कल्याणरायजी, रामकिशोर, सीता-राम, छोटे राम, छोटे दाऊजी, राधाबल्लभ, रामलला, गंगाबिहारी, गोवर्धननाथ, और शक्ति-मन्दिरों से सम्पन्न इस नगर में पर्वत के ऊपर एक शिलाखण्ड में भोजन-थारी का प्राकृतिक चिन्ह है । इन्द्रसेन पर्वत पर खिसलनी शिला, छटंकी-पंसेरी नामक शिलाखण्ड, व्योमासुर की गुफा और जसोमति शीतला भी यहाँ दर्शनीय हैं ।

कामवन से सुनहरा की कदमखंडी व पनिहारी कुण्ड होते हुए उँâचा गाँव और देहकुण्ड होकर यात्रा बरसाना जाकर मुकाम करती है । उँâचागाँव में बल्देव-मंदिर, नारायणभट्ट की समाधि, त्रिवेणी वूâप, चित्रशाला आदि दर्शनीय हैं । देहकुण्ड पर श्रीकृष्ण ने राधाजी की देह के बराबर स्वर्ण किसी भिक्षुक को दान में दिया था ।

‘बरसाना’ के मुकाम पर यात्री अनेकों प्राचीन-स्थलों का दर्शन करते हैं । बरसाना के दक्षिण में ४ कि.मी. पर डभारौ नामक गाँव में सूर्यकुण्ड तथा नौबारी-चौबारी देवी हैं । यहीं पर रत्न-कुण्ड भी है । पर्वत के नीचे दक्षिण दिशा में चिकसौली तथा थोड़ी दूर पर गहवरवन हैं, जहाँ ललितबिहारी, रासमण्डल और महाप्रभुजी की बैठक के दर्शन हैं । 

बरसाना के बाद यात्रा के मुकाम ‘नन्दगाँव’, ‘करहला’, ‘संकेतवन’ आदि स्थानों पर होते हैं । परिस्थिति और सुविधानुसार यात्राध्यक्ष इन मुकामों में परिवर्तन भी कर लेते हैं ।

करहला में कंकण-कुण्ड और रास-बिहारी तथा प्राचीन-मुकुट, महारास-मण्डल, कृष्णकुण्ड, श्रीनाथजी, महाप्रभुजी तथा बिट्ठलनाथजी की बैठकों के दर्शन हैं । यहाँ से ४।। कि.मी. दक्षिण में कमई गाँव में राजा मुचुकुन्द की गुफा, बलभद्र-कुण्ड रेवती-कुण्ड, सूर्य-कुण्ड और दाऊजी के दर्शन हैं । नैऋत्य कोण में १।। कि.मी. पर पिसायौ गाँव में किशोरीकुण्ड, श्याम- तलाई और श्यामजी की बैठक हैं ।

संकेतवन श्रीराधा-कृष्ण का प्रथम मिलन-स्थल है । यहाँ राधारमण-मन्दिर, विह्वल-कुण्ड, विह्वलादेवी, संकेतदेवी, संकेतबिहारी, कृष्ण-कुण्ड और महाप्रभुजी की बैठक के दर्शन हैं । निकट में ही चन्द्रावली सखी का गाँव रीठौरा है । श्रीकृष्ण भगवान की ननिहाल महरानों भी इसी क्षेत्र में है । भांडोखर, क्षीरकुण्ड, चन्द्रकुण्ड, श्यामकुण्ड, भ्रमरकुण्ड, साँचौली, गिढ़ोयौ, पुâलबारी-कुण्ड, मोती-कुण्ड आदि इस क्षेत्र के दर्शनीय स्थान हैं ।

नन्दगाँव में पर्वत पर विशाल और पक्का श्रीनन्द-भवन बना हुआ है । यहाँ नन्दकुण्ड, साँचकुण्ड, मनसादेवी, पावन-सरोवर, क्षुरणाहार कुण्ड, श्याम पीबरी, केबारी कुण्ड, याव-बट, हिदुल-बेदी, नारद-कुण्ड, नृसिंह-मन्दिर, वृन्दा-देवी, रंजखोर, दधीच-कुण्ड, रावरी-कुण्ड, मान्धीर-कुण्ड, पूर्णमासी-कुण्ड आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं । यहाँ से उत्तर दिशा में खदिरवन (खायरौगाँव) है । समीप ही नरी-सेमरी नामक देवियाँ हैं  । इस क्षेत्र के जाब और ‘कोकिलावन’ में भी कदाचित् परिक्रमा का पड़ाव होता है । 

कोकिलावन से चरण-गंगा व कामर होते हुए यात्रा का मुकाम ‘कोटवन’ अथवा ‘कोसी’ में होता है । इस मार्ग में शेषशायी, रासौली, गोपीनाथ, मदनमोहनजी, गोस्वामी गिरधारीलालजी की बैठक, धोमन-कुण्ड, व्यास-कुण्ड, दुर्वासा-आश्रम, दहग्राम आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं ।

कोटवन में सूर्यकुण्ड तथा निकट ही चमेलीवन (भुलावनौ गाँव) में गोपालकुण्ड, राम-तलाई, हनुमान-कुण्ड और हनुमान- मन्दिर हैं । कोटवन से यात्री कोसी पहुँचते हैं । 

कोसी या कुशस्थली पाण्डवों का अज्ञातवास-स्थल कहा जाता है । कोसी के निकट बुखरारी गाँव में बुखरारी-ताल, ग्वाल-कुण्ड और लोटनबिहारी के दर्शन करते हुए परिक्रमार्थी ‘शेरगढ़’ मे जाकर मुकाम करते हैं ।

परिक्रमा का अगला मुकाम मार्ग में औबौ, भीमागढ़ी, काचरौट गाँव तथा अक्षयवट (भान्डीरवन) का दर्शन करते हुए ‘चीरघाट’ पर जाकर होता है । चीरघाट पर श्रीमहाप्रभुजी की बैठक, कात्यायनी-मन्दिर और चीर-बिहारी के दर्शन हैं ।

चीरघाट से परिक्रमा ‘बच्छवन’ में  आकर मुकाम करती है । मार्ग में गाँगरौली, नन्दघाट, बसई, मई, दलौती, सेई, तरौली आदि स्थान हैं ।

बच्छवन में श्रीराधाकृष्ण-मंदिर और बच्छ-वूâप, ब्रह्म-कुण्ड और श्रीमहाप्रभुजी की बैठक दर्शनीय हैं । बच्छवन में यमुना के पार माँटवन और भद्रवन (भदौरा) हैं । बच्छवन से यात्री प्राय: नावों के द्वारा यमुना-पुलिन का सौन्दर्य निहारते हुए बेलवन के पास से गुजरते हुए यात्रा के अगले मुकाम ‘श्रीधाम-वृन्दावन’ में आ जाते हैं ।

वृन्दावन से यमुना पार करके मानसरोवर, पानीगाँव, कनारई, वृहद्वन आदि स्थानों का दर्शन करते हुए यात्रा का मुकाम ‘लोहवन’ में होता है, जो कि मथुरा नगर के सामने पूर्व दिशा में यमुना-पार स्थित एक बड़ा गाँव है ।

लोहवन के बाद अगला मुकाम ‘बलदेव’ (दाऊजी) में होता है । चीते का नगला, काजी की नगरिया, गोपी की नगरिया, रसखान-समाधि, नन्दी-बनन्दी देवी आदि स्थानों पर होते हुए यात्री बलदेव पहुँचते हैं । अगला मुकाम ‘गोकुल’ में होता है । कच्चे मार्ग से हथौड़ा, चिन्ताहरण, ब्रह्माण्ड-घाट, महावन, रमणरेती आदि का भ्रमण करते हुए यात्री गोकुल पहुँचते हैं । गोकुल से रावल (श्रीराधा-जन्मस्थली) होते हुए मथुरा नगरी में वापस पहुँचकर परिक्रमार्थी मथुरा नगर की पंचव्रâोशी परिक्रमा करते हैं । तत्पश्चात् यात्रीगण ‘नियम-विसर्जन’ करके यात्रा सम्पूर्ण करते हैं ।


मथुरा-परिक्रमा-माहात्म्य


मथुरा में स्नान, देवदर्शन तथा परिक्रमा– ये तीन ही मुख्य कर्म हैं, जिनके विषय में पुराणों में बड़ी महिमा मिलती है–

मथुरां समनुप्राप्य यस्तु कुर्यात् प्रदक्षिणम् ।
प्रदक्षिणीकृता  तेन  सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।।
(बाराह पुराण : १५९/९४)

अर्थात्– मथुरा की परिक्रमा करने पर सातों द्वीपों वाली इस पृथ्वी की परिक्रमा करने के सदृश फल प्राप्त हो जाता है ।

पौराणिक मान्यता के अनुसार हरिशयनी एकादशी के बाद चार मास के लिए सातों द्वीपों के पुण्यमय तीर्थ और मन्दिर मथुरा में ही निवास करते हैं । अत: देवशयनी और देवोत्थापनी एकादशी को मथुरा-परिक्रमा की आदि-परम्परा रही है । अनेक श्रद्धालुजन इन दोनों तिथियों को मथुरा सहित गरुड़-गोविन्द और वृन्दावन की परिक्रमा भी करते रहे हैं । 

वैसाख शुक्ला पूर्णिमा की रात्रि में मथुरा की परिक्रमा करने का पौराणिक उल्लेख मिलता है । प्रत्येक एकादशी और पर्वों के अतिरिक्त कार्तिक शुक्ला नवमी (अक्षय नवमी) को मथुरा की सामूहिक परिक्रमा करने की प्राचीन परिपाटी है । बाराह-पुराण के अनुसार ब्रह्माजी की आज्ञा से सातों ऋषियों ने ध्रुव सहित अक्षय नवमी के दिन ही मथुरा की परिक्रमा की थी । इस दिन मथुरा-परिक्रमा करने वाला अपने समस्त कुटुम्बियों सहित विष्णुलोक को प्राप्त होता है–

एवं प्रदक्षिणां कृत्वा नवम्यां शुक्ल कौमुदे ।
सर्व कुलं  समादाय विष्णुलोेके महीयते ।।

मथुरा-परिक्रमा के प्रभाव से ब्रह्महत्या, सुरापान, गो-हत्या आदि पापों से छूटकर मनुष्य पवित्र होता है–

ब्रह्मघ्नश्च  सुरापश्च  गोघ्नो भग्नव्रतस्तथा ।
मथुरां तु  परिक्रम्य  पूतो भवति मानव: ।।
(बाराह-पुराण : १५८/३६)


पुरिन में पुरी ना मधुपरी-सी पुरी कोऊ,
बरनी  बाराह-रूप, धरनी  धराए  सों ।
    चार  मुक्ति  दाता, चार बेदन की माता, 
रुचि रची है विधाता, वेद-बेदन जस गाए सों ।। 
पिप्लेश्वर, रंगेश्वर, भूतेश्वर, गोकरन, 
दीर्घविष्णु, केशवदेव सोभा सरसाए सों। 
मेंटत भय-भ्रांति, बढ़ावै पुनि कांति,
संत-मुनी शांति, विश्रान्ति घाट न्हाए सों।।


मथुरा की पंचक्रोशी परिक्रमा


परिक्रमा का आरम्भ विश्रामघाट से होता है । सर्वप्रथम विश्रामघाट के निकट ही गुह्यतीर्थ और प्राचीन ‘सती का बुर्ज’ है । तदुपरान्त प्रयाग-तीर्थ और वेणीमाधव-मन्दिर हैं । आगे श्यामघाट और श्यामाश्याम मन्दिर, अनन्तर शृङ्गार-घाट, श्रीरामेश्वर- मन्दिर और रामतीर्थ, उससे आगे पुष्टि-सम्प्रदाय के दाऊजी, बड़े मदनमोहनजी तथा छोटे मदनमोहनजी के मन्दिर और कनखल तीर्थ हैं । आगे तिन्दुक तीर्थ (वर्तमान में लुप्त) बंगालीघाट पर है । उससे कुछ आगे से घूमकर चलते हुए कश्मीरी पंडित ‘ल्स काक’ द्वारा निर्मित शिव-मन्दिर (अद्भुत वास्तुकला-युक्त) है । आगे चलकर सूर्य-तीर्थ तथा सूर्य-मन्दिर हैं । तदनन्तर नाग-तीर्थ और नाग-टीला है । उससे आगे ध्रुव- मन्दिर है । 

ध्रुव-तीर्थ से कुछ आगे परिक्रमा-मार्ग पश्चिम और नैर्ऋत्य कोण की ओर मुड़ जाता है । इस मोड़ के समीप ऊँचे टीले पर बायीं ओर सप्तर्षि-दर्शन तथा कुछ आगे दाहिनी ओर टीले पर राजा बलि, वामन भगवान और शुक्राचार्य के दर्शन हैं । आगे बाड़ा जयरामदास में प्राचीन श्रीराम-मन्दिर है । बायीं और राजकीय उत्तरमाध्यमिक विद्यालय से सड़क  पार करके नैर्ऋत्य कोण की और परिक्रमा-मार्ग मुड़ जाता है ।

आगे दाहिने हाथ पर बहुत ऊँचा धनुष-टीला है, जहाँ श्रीकृष्ण-बलराम ने वंâस का धनुष तोड़ा था । उससे आगे बायीं ओर सुदामा माली का प्राचीन-स्थल है, जहाँ उसने भक्ति सहित श्रीकृष्ण-बलराम का पुष्प शृङ्गार किया था । आगे कुब्जा-कृष्ण- मन्दिर बायीं ओर उँâचे चढ़कर है । कुब्जा ने श्रीकृष्ण-बलराम को चन्दन-चर्चित किया था । उसके समीप दायीं और रंगभूमि में चाणूर-माणूर-मुष्टिक-वूâट-शल-तोसल आदि मल्लों से श्रीकृष्ण बलराम के मल्लयुद्ध के दर्शन हैं, यहीं पर कुबलयापीड़ हाथी- संहार-स्थल है । इस मन्दिर के पीछे मथुरा नगर के मौहल्ले अन्तापाड़े में प्राचीन सूर्यादि नवग्रहों का मन्दिर है, जो परिक्रमा-मार्ग से हटकर है । (उक्त सभी स्थल स्थानीय प्रशासन, नगरपालिका परिषद और स्थानीय स्वार्थी तत्वों की मनमानी के चलते वर्तमान समय में लुप्तप्राय हो गए हैं ।) 

रंगभूमि में रंगेश्वर महादेव तथा उसके पाश्र्व में वंâसटीला है, जहाँ श्रीकृष्ण-बलराम द्वारा वंâस-वध की झाँकी है । रंगेश्वर महादेव मथुरा नगर के दक्षिण द्वार के कोटपाल हैं । इनके निकट ही उदासीन संप्रदाय के सन्तों का श्रीकृष्ण-बलराम-मन्दिर भी स्थित है । 

रंगेश्वर से आगे चलकर परिक्रमा-मार्ग पश्चिम की ओर मुड़ जाता है । सड़क पर आगे बायीं और वामनजी और दाऊजी के दर्शन हैं । आगे संस्कृत-महाविद्यालय तथा राजकीय पुरातत्व संग्रहालय होते हुये परिक्रमा-मार्ग नैर्ऋत्य दिशा की ओर मुड़ता है । संग्रहालय-परिसर में सात-समुद्री वूâप है, जिसका प्राचीन ग्रन्थों में तथा पुराणों में भी वर्णन मिलता है ।

संग्रहालय से नैर्ऋत्य की ओर चलते हुए परिक्रमा-मार्ग में दाहिनी ओर चतुर्दिक पक्का बना हुआ विशाल कुण्ड है, जिसे शिवताल कहते हैं । इसका निर्माण बनारस के राजा पटनीमल ने कराया था । यहाँ शिवजी का सुन्दर मन्दिर है । इससे आगे वायव्यकोण पर वंâकाली देवी का दर्शन है । यह वंâस की आराध्य देवी होने से वंâस-काली के नाम से विदित हुई । अपभ्रंश रूप में इसका कंकाली नाम प्रचलित है ।

इससे आगे वायव्य कोण की ओर चलते हुए भूतेश्वर-क्षेत्र आता है । सर्वप्रथम बायीं ओर पक्का बलभद्र कुण्ड है जिसके उत्तरी भाग में प्राचीन श्रीबलभद्र प्रभु के दर्शन हैं । मार्ग के दाहिनी ओर भूतेश्वर अखाड़ा है जो ब्रज की प्राचीन मल्ल-विद्या का केन्द्र रहा है । आगे चलकर आदिबाराह एवं नृसिंहजी के मन्दिर हैं । इससे आगे सड़क पार करके मथुरा के क्षेत्रपाल श्रीभूतेश्वर महादेव का उन्नत शिखरयुक्त पक्का और विशाल मन्दिर है । इसी मन्दिर में बहुत नीचे पृथ्वी के अन्दर पाताल भैरवी के दर्शन हैं ।

पुन: आगे चलकर यात्री श्रीकृष्ण-जन्मभूमि-क्षेत्र में पहुँचते हैं । सर्वप्रथम धर्मराज की प्राचीन ज्ञान-वापी, फिर बहुत विशाल पक्का बना हुआ पोतराकुण्ड है । आगे बायीं ओर वंâस का कारागार स्थल है जिसमें देवकी-वसुदेव तथा बालकृष्ण के दर्शन हैं । आगे कुछ मुड़कर दाहिनी ओर पक्का और विशाल भगवान श्रीकेशवदेव का प्राचीन मन्दिर है । यही मथुरा के आदि देव हैं । जन्मभूमि-क्षेत्र की प्राचीन बगीचियों में और भी कई छोटे-बड़े देव-मन्दिर हैं । केशवदेव मन्दिर के पूर्वभाग में नवनिर्मित केशवदेव मन्दिर, श्रीकृष्ण चबूतरा, गर्भ-गृह और भागवत-भवन विद्यमान हैं । इसका निर्माण पं. मदनमोहन मालवीय की प्रेरणा से श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा-संस्थान नामक संस्था द्वारा किया गया है ।

मल्लपुरा से आगे गत्र्तेश्वर कुण्ड और उसके दाहिनी ओर श्रीगत्र्तेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर है । यहाँ से वायव्य कोण में स्थित उन्नत शिखरयुक्त श्रीमहाविद्या देवी का प्राचीन मन्दिर है । इस मन्दिर में पीताम्बरा, धूमावती व हनुमानजी के भी दर्शन हैं । इसके निकट ही महाविद्या कुण्ड या अम्बिका कुण्ड है । उससे आगे मथुरा के रामलीला मैदान के निकट से गुजरकर परिक्रमार्थी ईशान कोण की ओर स्थित सरस्वती कुण्ड पर पहँुचते हैं । इस कुण्ड के अब केवल भग्नावशेष ही विद्यमान हैं । यहाँ श्रीमहासरस्वतीजी का मन्दिर है जिसमें श्रीगणेशजी और सत्यनारायण के भी दर्शन हैं । आगे सड़क पार कर चलते हुए श्रीचामुण्डा (छिन्नमस्ता) देवी का भव्य मन्दिर है । उससे आगे चलते हुए वृन्दावन रोड पार करके पूर्व की ओर घूमकर यात्री गोकर्ण-क्षेत्र पर आते हैं ।

गोकर्ण-क्षेत्र से पहले अनन्ताक्ष-तीर्थ और गणेश-तीर्थ पड़ते हैं जो परिक्रमा-मार्ग से हटकर हैं । बायीं ओर रुद्र-महालय तीर्थ है । दाहिनी ओर ऊँचे टीले पर शास्त्रवणर््िात श्रीगोकर्णेश्वर महादेव का प्राचीन और पक्का मन्दिर है । गोकर्ण से आगे यमुना-तट पर दशाश्वमेध और धारापत्तन-तीर्थ हैं । दशाश्वमेध से पश्चिम की ओर सड़क से मुड़ते हुए बायीं ओर नीलवंâठेश्वर महादेव का अति विशाल और उन्नत शिखरयुक्त पक्का मन्दिर है । आगे सड़क के दाहिनी ओर अम्बरीष टीला है । आगे बायीं ओर महामाया-मंदिर तथा चक्रतीर्थ-महादेव का दर्शन है । यहाँ से यमुना-तट पर चलते हुए यात्री श्रीचैतन्य महाप्रभु द्वारा स्थापित गंगा-मन्दिर पर आते हैं । यहीं व्यास-पीठ तथा कालिन्देश्वर का प्राचीन दर्शन है । इसी घाट पर पंचमुखी हनुमान तथा अष्टादशभुजी महिषमर्दिनी देवी का मनोरम दर्शन है । उससे आगे श्रीगिरिराज-मन्दिर, पुन: सोमतीर्थ और सोमश्वर शिव के मन्दिर हैं । यहीं अन्नपूर्णा देवी तथा घंटाभरण तीर्थ है । आगे गऊघाट है जहाँ किसी समय महर्षि उपमन्यु का आश्रम था । यहाँ वंâस-किले की सीढ़ियों पर चिन्ताहरण शिव के दर्शन करते हुए यात्री वंâस-किले पर पहँुचकर प्राचीन कालभैरव और वंâसेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं । 

वंâस-किले से उतरकर घूमते हुए यमुना-तट पर बैकुण्ठ- तीर्थ और बैकुण्ठेश्वर शिव हैं । यहाँ से आगे भरतपुर के धाऊओं द्वारा स्थापित और निर्मित श्रीगंगाजी का मन्दिर और तीन पक्के घाट हैं । यहीं पर उलाव रियासत (बिहार) की रानी द्वारा बनवाया हुआ श्रीराधेश्याम-मन्दिर है । आगे वसुदेवघाट (वर्तमान स्वामी घाट) पर श्रीदेवकी-वसुदेव और श्रीकृष्ण का दर्शन है । आगे संयमन-तीर्थ है । यहीं श्रीयमुनाजी का प्राचीन मन्दिर व श्रीराम-मन्दिर है । इससे आगे नवभंजक तीर्थ है । वर्तमान में इसे सन्त घाट कहते हैं ।

पुन: बड़वाला घाट होते हुए परिक्रमार्थी असिकुण्ड तीर्थ पर पहँुचते हैं जिसे असकुण्डा घाट भी कहा जाता है । यहाँ श्रीगणेशजी, श्रीवाराहजी, श्रीनृसिंहदेवजी तथा श्रीहनुमान-मन्दिर व श्रीराधाकृष्ण के दर्शन हैं । साथ ही उन्नत शिखरदार सती देवी का मन्दिर भी है । उससे आगे श्रीलक्ष्मीचन्द सेठ की हवेली का पृष्ठभाग और आगे मणिकर्णिका-तीर्थ होते हुए यात्री अविमुक्त तीर्थ पर आते हैं । यहीं श्रीबल्लभाचार्यजी की बैठक है । यात्रा का नियम-ग्रहण और सम्पूर्णता यहीं होती है ।


ब्रज की पंचतीर्थी-परिक्रमाएँ


ब्रज में ‘पंचतीर्थी-परिक्रमा’ के नाम से मुख्यत: दो परिक्रमाओं का प्रचलन रहा है । इनमें से एक श्रीयमुनाजी के पश्चिम में तथा दूसरी पूर्व में स्थित तीर्थों के परिभ्रमण-दर्शन के लिए श्रद्धालु भक्तों द्वारा लगायी जाती है । प्रथम पंचतीर्थी नाम से विख्यात परिक्रमा श्रीयमुनाजी के पश्चिमी तट पर अवस्थित मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन और वृन्दावन नामक पाँच तीर्थों की होती है । इस परिक्रमा को भाद्रपद कृष्णा एकादशी के दिन लगाये जाने की परम्परा रही है । यद्यपि वर्तमान में इसका प्रचलन नहीं रह गया है, फिर भी विगत शताब्दी के प्रारम्भ तक यह पंचतीर्थी परिक्रमा पर्याप्त रूप में प्रतिष्ठित और प्रचलित रही । एफ. एस. ग्राउस की प्रसिद्ध पुस्तक ‘मथुरा : ए डिस्ट्रिक्ट मेमोयर’ के पृष्ठ ८० पर इसका मार्ग मधुवन, शान्तनु कुण्ड, गनेसरा, गरुड़-गोविन्द और वृन्दावन आदि होते हुए वर्णित किया गया है । 
दूसरी पंचतीर्थी परिक्रमा श्रीयमुनाजी के पूर्वांचल में स्थित नन्दनवन, मुंजाटवी वन, ऋणमोचन, पापमोचन और ब्रह्माण्ड तीर्थों की है । यह कार्तिक शुक्ला चतुर्थी  को प्रारम्भ की जाती है । ब्रज के ग्राम्यांचलों के अनेक जन आज भी बड़े उत्साह से इस परिक्रमा को करते हैं । इसे अनंदी-बंदी की परिक्रमा के नाम से जाना जाता है ।
पंचतीर्थी परिक्रमाओं को मथुरा में विश्राम घाट से प्रारम्भ करके पुन: यहीं पर समाप्त करने की परम्परा है ।

नंदी-वनंदी परिक्रमा


विश्राम घाट पर संकल्प ग्रहण करने के पश्चात् श्रीयमुनाजी को पार करके परिक्रमार्थीजन चमन नगला, पोला का नगला और तारापुर होते हुए बंदी नामक ग्राम में पहुँचते हैं । भविष्योत्तर पुराण में इसे नन्दनवन कहा गया है । यहाँ नंदी-वनंदी नामक दो वैष्णवी देवियों के दर्शन हैं । इन्हें नन्दबाबा की कुलदेवी भी कहा जाता है । परिक्रमार्थीगण यहाँ के सरोवर में स्नान-आचमन करके आगे मुंजाटवी-वन की और प्रस्थान करते हैंै । पुराणों में वर्णित इस वन में श्रीकृष्ण ने दावानल-पान किया था । इसी मुंजाटवी वन में उत्तर भारत का प्रसिद्ध श्रीबलदेवजी का मन्दिर है । बलदेव-मन्दिर के निकट स्थित विशाल क्षीर-सागर नामक कुण्ड है जिसकी परिक्रमा का अपना विशिष्ट ही माहात्म्य है । परिक्रमार्थी यहाँ रात्रि-विश्राम करते हैं, इसके पश्चात् कच्चे मार्ग से लौटते हुए क्रमश: ऋण-मोचन और पाप-मोचन तीर्थों की ओर प्रस्थान करते हैं ।

श्रीयमुना-तट पर स्थित ऋणमोचन और पापमोचन तीर्थों के बारे में अनुश्रुति यह है कि श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव  पर कोष लुटाते हुए जब कुबेर का कोष खाली हो गया तो कुबेर ने श्रीमहालक्ष्मी से ऋण लेने का पाप करते हुए अपने कोष की वृद्धि की थी । बाद में श्रीकृष्ण ने दर्शन देकर कुबेर को ऋण लेने के पाप से मुक्त किया था । यहाँ से आगे ब्रह्माण्ड घाट नामक वह स्थान है जहाँ श्रीकृष्ण ने मिट्टी खाकर अपने मुख में माँ यशोदा को ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया था । 

ब्रह्माण्ड घाट से लगभग १ किमी० दूर महावन में चौरासी खम्भा, नन्द-भवन, षष्ठी-पूजन, पूतना-खार, योगमाया- मन्दिर आदि के दर्शन करने के पश्चात् रमणरेती और गोकुल होते हुए यात्रीगण श्रीराधा-जन्मस्थली रावल नामक गाँव की परिक्रमा करते हुए मथुरा पहँुच कर विश्राम घाट पर संकल्प कर दक्षिणा आदि देकर इस परिक्रमा को पूर्ण करते हैं ।

ब्रज के लोकजीवन में इन पंचतीर्थी परिक्रमाओं का अनादिकाल से प्रचलन रहा है । ब्रज-चौरासी कोस की परिक्रमा का नेतृत्व जहाँ धर्माचार्याें एवं संप्रदायाचार्याें द्वारा किया जाता है तथा तीर्थ-पुरोहितों द्वारा चौरासी-कोस परिक्रमा-मार्ग के तीर्थाें पर शास्त्रीय विधान के अनुसार दान-पुण्य की परंपरा का निर्वहन यात्रियों से  करवाया जाता है, वहीं यह पारंपरिक पंचतीर्थी परिक्रमा ब्रजवासियों द्वारा स्वतःस्पूâर्त अन्तःप्रेरणा से प्रेरित होकर की जाती हैं तथा इनमें किसी पुरोहित की भूमिका नहीं होती है । पंचतीर्थी परिक्रमा-मार्ग के गाँवों और तीर्थ-स्थलों पर स्थानीय ग्रामीणजन परिक्रमार्थियों की सेवा-सुश्रूषा बड़े ही उत्साह, चाव और श्रद्धा-भाव से करते हैं । जगह-जगह यात्रियों के पड़ाव-स्थलों पर मीठे पानी की प्याऊ और भण्डारे आयोजित किये जाते हैं । ब्रज चौरासी कोस यात्रा के विपरीत इस परिक्रमा में ब्रज के लोकजीवन की तथा श्रीकृष्ण-लीला-स्थलों के प्रति ब्रजवासियों की अटूट श्रद्धा की अपूर्व झाँकी का दिग्दर्शन होता है । कार्तिक शुक्ल पक्ष में इस परिक्रमा का कमोबेश प्रचलन आज भी विद्यमान है ।

गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा


‘गर्ग संहिता’ में उल्लेख मिलता है कि भारतवर्ष के पश्चिम भाग में स्थित शाल्मली द्वीप में पर्वतराज द्रोणाचल के गृह में उनकी पत्नी के गर्भ से श्रीगोवर्धनजी का जन्म हुआ था । देवताओं ने पुष्प-वर्षा करके श्रीगोवर्धननाथ की वन्दना की । 

एक बार भ्रमण करते हुए पुलस्त्य ऋषि शाल्मली द्वीप में पहुँचे । गिरि गोवर्धन को तपोभूमि के उपयुक्त देखकर ऋषि ने उनके पिता द्रोणाचल से उसे काशी ले जाने के लिये माँग लिया । गोवर्धन ने चलते समय ऋषि से कहा, ‘मुझे एक बार आप जहाँ रख दोगे, वहाँ से मैं फिर नही उठूँगा’ ।

पुलस्य ऋषि बाल-पर्वत (गोवर्धन) को हाथ में धारण कर जब ब्रज-मंडल से होकर जा रहे थे, तब जन्म के संस्कारों के कारण ब्रज-मंडल की भूमि उस बाल-पर्वत को बड़ी दिव्य और रमणीय लगी । तब उसने अपने शरीर को इतना भारी कर दिया कि ऋषि ने थक करके उसे वहीं रख दिया । थोड़ी देर विश्राम करने के  पश्चात् पुन: उस बाल-पर्वत गोवर्धन को उठाने पर वे ऋषि से कहने लगे, ‘मुनिवर ! आप प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि जहाँ आप मुझे रख दोगे वहाँ से मैं फिर नहीं उठूंगा । इसलिये अब आप मुझे यहाँ से न उठाइये’ । उसी समय से गिरि-गोवर्धन ब्रज-मंडल में स्थित      हो गया । 

वर्णन मिलता है कि ऋषि ने क्रोधपूर्वक गोवर्धन को श्राप दिया था कि तुम तिल-तिल भर प्रतिदिन क्षीण होते जाओगे । पुराणों में ऐसा वर्णन मिलता है कि गिरि-गोवर्धन पाँच योजन लम्बा तथा दो योजन उँâचा था । आज कदाचित् उसी ऋषि-श्राप के कारण गोवर्धन-पर्वत का स्वरूप निरंतर क्षीण हो रहा है । यह पर्वत सात कोस के बीच में है तथा इसके परिक्रमा-मार्ग में अनेक कुण्ड तथा तीर्थ स्थित हैं । गोवर्धन में कुछ काल पूर्व तक सुरम्य वनश्री तथा लता-वुंâजों का दृश्य बड़ा ही मनोरम था, किन्तु कलि के प्रभाव से अब इसकी शोभा दिनों-दिन क्षीण होती जा रही है ।

गोवर्धन से पूँछरी की परिक्रमा चार कोस की है, जो गोवर्धन नगर में दानघाटी-मन्दिर से प्रारम्भ होकर आन्यौर, पूँछरी (राजस्थान), जतीपुरा होती हुई गोवर्धन  में ही आकर सम्पन्न होती है । इसे बड़ी परिक्रमा भी कहते हैं । इस परिक्रमा- मार्ग में दानघाटी, दाऊजी, चरणामृत कुण्ड, रमणरेती-आश्रम, आन्यौर गाँव में श्रीनाथजी का प्राकट्यस्थल, गोविन्द कुण्ड, पूँछरी का लौठा, नवल-अप्सरा कुण्ड, लुकलुक दाऊजी का मन्दिर, सुरभि कुण्ड, हरजी कुण्ड, सत्यनारायणजी का मन्दिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं । गोवर्धन से राधाकुण्ड की परिक्रमा तीन कोस की है जिसे छोटी परिक्रमा कहते हैं । इस परिक्रमा-मार्ग में मानसी-गंगा, हाथी-दरवाजा, चूतरटेका, उद्धव कुण्ड, चैतन्य महाप्रभु मन्दिर, राधाकुण्ड-श्यामकुण्ड, दुर्गादेवी का मन्दिर, बालाजी, कुसुम-सरोवर, नारद कुण्ड, किलोल कुण्ड, हरगोकुल, मुखारबिन्द, चकलेश्वर महादेव, गंगाजी,  हरदेवजी, मंसादेवी आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं । 

वैसे तो गोवर्धन-परिक्रमा प्रतिमास की एकादशी से पूर्णिमा तक करने की परंपरा रही है, किन्तु वर्तमान समय में गिरि-गोवर्धन के प्रति लोगों की आस्था निरंतर बढ़ती जा रही है और अब यह परिक्रमा बारहों महीने तथा चौबीसों घण्टे श्रद्धालु भक्तजन करते हैं । विशिष्ट अवसरों पर तथा मुड़िया पूनों (गुरु पूर्णिमा) एवं पुरुषोत्तम मास में लाखों की संख्या में भक्तजन इस परिक्रमा को अपूर्व श्रद्धा के साथ करते हैं । गोवर्धन की दण्डवती एवं दूध-धार की परिक्रमा का भी विशेष प्रचलन है ।

वृन्दावन-परिक्रमा


‘भविष्य पुराण’ में वृन्दावन की परिक्रमा पाँच कोस की लिखी है । ‘वाराह संहिता’ में रासस्थल वृन्दावन की परिधि एक योजन बतायी गई है । किन्तु, वृन्दावन की वत्र्तमान परिक्रमा साढ़े तीन कोस की है । वृन्दावन के निवासी बताते हैं कि यमुना की धारा ने गहवरवन और पामरवन को काटकर परिक्रमा के मार्ग को छोटा कर दिया है । 

आज भी यमुना की तलहटी में प्रवाह के बीच में खड़ी अनेक कुओं की कोठियाँ दिखाई दे जाती हैं । वस्तुत: पहले यहाँ बड़े-बड़े बाग थे, जिन्हें यमुना बहा ले गई । ऐसा अनुमान है कि यमुना की धारा ने एक ओर से वृन्दावन की लगभग १ मील चौड़ी भूमि को काट दिया है । यह बात इससे भी सिद्ध होती है कि जिस मानसरोवर नामक स्थान से श्रीहितहरिवंशजी नित्य ठाकुर-सेवा के लिए आते थे, वह अब यमुना के दूसरी पार स्थित है । परिक्रमा के छोटे हो जाने का कारण यमुना द्वारा किया गया भूमि का कटाव ही है । 

वृन्दावन की वत्र्तमान परिक्रमा प्राय: सूर्यघाट से  प्रारम्भ होती है । इसके मार्ग में क्रमश: मदनेश्वर महादेव, जुगलकिशोर, इमलीतला, शृङ्गारवट, चीरघाट, केशीघाट, धीर-समीर, सुदामा कुटी, मालाधारी अखाड़ा, टटिया स्थान, चेतनकुटी, नरहरिदास, आदिबद्री, श्यामकुटी, बीसभुजी हनुमान, गोपालखार, देवी राजपुर, वृन्दावनेश्वरी, नीमकरोरी, संकटमोचन हनुमान, गोरे दाऊजी, अटलबिहारी, रामनाम गुफा, राधेश्याम कुआँ, वन बिहार, रमणरेती, वाराहघाट, गौतम ऋषि, मदनटेर, गऊघाट, रामगिलोला, कालीदह एवं मदनमोहन-मन्दिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थान हैं ।

वृन्दावन-परिक्रमा-मार्ग की दशा दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है इसकी सुरक्षा का दायित्व स्थानीय नागरिकों और शासन पर समान रूप से है । गोवर्धन की भाँति यहाँ भी स्थानीय निवासियों, संत-महात्माओं एवं आगन्तुक तीर्थार्थियों द्वारा विशेष अवसरों पर तथा अनेकों निष्ठावान् भक्तों द्वारा नित्यप्रति भी परिक्रमा करने का प्रचलन है । अत: लाखों परिक्रमार्थियों की भावना की रक्षा करते हुए परिक्रमा-मार्ग की रक्षा और व्यवस्था की महती आवश्यकता है । 


तीन वन (गरुण-गोविन्द) परिक्रमा


मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा दो वन या जुगल-परिक्रमा कहलाती है । इसमें गरुड़-गोविन्द को भी परिधि में लेकर परिक्रमा करने पर उसे तीन वन की परिक्रमा कहते हैं । वृन्दावन-निवासी स्त्री-पुरुषों द्वारा कार्तिक शुक्ला नवमी (अक्षय नवमी) को तथा मथुरा-निवासियों द्वारा देवोत्थान एकादशी के दिन यह परिक्रमा सम्पन्न की जाती है । 

मथुरा तथा वृन्दावन की परिक्रमाओं के मार्ग आदि का विवरण इस पुस्तक के अन्य पृष्ठों पर पृथव्â-पृथव्â दिया गया है । मथुरा-परिक्रमा-मार्ग में सरस्वती कुण्ड से उत्तर-दिशा में मथुरा-दिल्ली-राजमार्ग पर चलते हुए परिक्रमार्थी गाँव छटीकरा स्थित गरुड़गोविन्द नामक स्थान पर पहँुचते हैं । यहाँ गरुड़-वाहन श्रीविष्णुभगवान का प्राचीन मन्दिर है । यह प्रतिमा बङ्कानाभ द्वारा स्थापित बतायी जाती है ।

‘वाराह पुराण’ के अनुसार गरुड़जी यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ पधारे तो उन्हें सभी ब्रजवासी चतुर्भुजी विष्णु के रूप में दिखाई पड़े थे । बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने बारह-भुजा विष्णु-स्वरूप का दर्शन देकर गरुड़ का भ्रम दूर किया ।

‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ के अनुसार एक बार गरुड़जी कालिया नाग को मारने के लिए उसका पीछा करते हुए यहाँ तक आये । किन्तु मार्ग में सौभरि ऋषि ने उन्हें रोकते हुए कहा कि मेरी इस तपस्थली में कालियनाग को मारोगे तो भस्म हो जाओगे । परिणामस्वरूप कालियनाग तो यमुना में जाकर सुख से रहने लगा और गरुड़जी इस स्थान पर उसकी प्रतीक्षा में डटे रहे । 

अन्य भी कई कथाएँ इस प्राचीन-स्थल के विषय में पुराणों में मिलती हैं । गरुड़-गोविन्द के दर्शन के बाद परिक्रमार्थीगण वृन्दावन की ओर प्रस्थान करते हैं और रमणरेती से ही वृन्दावन परिक्रमा मार्ग पर चलते हुए भतरोड़ बिहारी, अव्रूâरघाट, गणेशतीर्थ आदि मथुरा-वृन्दावन मार्ग के प्राचीन स्थलों का दर्शन करते हुए पुन: मथुरा-परिक्रमा की धारा में सम्मिलित हो जाते हैं ।


ब्रज में प्रचलित अन्य परिक्रमाएँ


ब्रज के प्राय: प्रत्येक वन-उपवन की परिक्रमा का पृथक््â-पृथव्â परिमाण और माहात्म्य ग्रन्थों में वर्णित हैं । ब्रज के वन, उपवन, प्रतिवन आदि की संख्या ‘ब्रज-भक्ति-विलास’ नामक ग्रंथ में १३१ गिनायी गई है, जबकि ‘भविष्यपुराण’ में यह संख्या १२६ है । वस्तुत: काल-प्रभाव, भौगोलिक परिवर्तन तथा विकास-कार्यों के कारण वत्र्तमान में अनेक वन लुप्त हो गए हैं । फिर भी जो स्थान अभी शेष बचे हैं, उनकी भक्त लोग अभी भी नियम से अथवा विशेष पर्वों पर परिक्रमा करते हैं । 
‘विष्णु रहस्य’ नामक ग्रंथ में ब्रज के वन-उपवनादि को भगवान के अंगों के रूप में माना गया है । ‘वृहद् गौतमीय तन्त्र’ में ब्रज के प्रत्येक वन के अधीश्वर देव, उनका ध्यान, विनियोग, न्यास और मंत्र-जप के साथ परिक्रमा करने का सविस्तार वर्णन मिलता है । सीमित पृष्ठों की इस लघु-पुस्तिका में स्थानाभाव के कारण ब्रज-मंडल की समस्त परिक्रमाओं का वर्णन सम्भव नहीं है ।

नित्य, उत्सवीय और सत्संगीय संयोग से परिक्रमा करने के अवसर भक्तों के सन्मुख उपस्थित होते हैं । अनेक लोग मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु भी परिक्रमाएँ देते हैं, यथा– वैसाख एवं श्रावण मास के शनिवार के दिनों में नारदवन (कुण्ड) की आधे कोस की परिक्रमा भक्ति को बढ़ाने वाली, कार्तिक पूर्णिमा को सेई-तरौली की डेढ़ कोस की परिक्रमा कुष्ठ-रोग की निवृत्ति के लिए, भाद्रपद शुक्ला सप्तमी को शान्तनु कुण्ड की एक कोस की परिक्रमा सन्तान प्राप्ति के लिए, भाद्रपद शुक्ला छठ को पानीगाँव की आधे कोस की परिक्रमा सर्प-दंश से उत्पन्न रोगों की निवृत्ति के लिए तथा कार्तिक कृष्णा अष्टमी को राधाकुण्ड की १ कोस की परिक्रमा सन्तान-प्राप्ति तथा भक्तिवद्र्धन के लिए सिद्धिदायिनी बतायी गई हैं । इसी प्रकार श्रावण में बटेश्वर (आगरा ) तथा शनिवार को कोकिलावन की परिक्रमाएँ देने की परम्परा आज भी बनी हुई है ।

और भी अनेक स्थान जो काल-प्रभाव से लुप्त होने से बच गए हैं, वे भक्तों और श्रद्धालुओं के लिए परिक्रमा-पथ अभी भी बने हुए हैं ।

ब्रज के प्रमुख दर्शनीय स्थल


मथुरा– मथुरा के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में श्रीकृष्ण जन्मस्थान की महत्ता सर्वोपरि है । सैकड़ों वर्षों तक यह स्थान विधर्मी आक्रमणकारियों द्वारा ध्वस्त किये जाने के कारण खण्डहररूप में रहा । देश के स्वतन्त्र होने के बाद श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा-संस्थान संस्था द्वारा इस स्थल का जीर्णोद्धार किया गया और आज यह विश्वभर के सनातन हिन्दूधर्मी श्रद्धालुओं के आकर्षण व श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है । 

श्रीकृष्ण जन्मस्थान के अलावा मथुरा नगर में विश्रामघाट तथा श्रीद्वारकाधीश मन्दिर भी प्रमुख हैं । विश्रामघाट यमुना-तट का प्रधान घाट है । ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण-बलराम ने वंâस को मारकर इसी स्थान पर विश्राम लिया था । विश्रामघाट पर प्रतिदिन प्रात: व सायं श्रीयमुनाजी की भव्य आरती दर्शनीय होती है । यमुनाजी के साथ उनके भाई यमराज का मन्दिर भी इसी घाट पर है । भारत में कदाचित् यमराज का यह अकेला मन्दिर है । कार्तिक मास में यमद्वितीया का प्रसिद्ध स्नान इसी घाट पर होता है । ब्रज-परिक्रमा तथा मथुरा-परिक्रमा की शुरूआत इसी घाट से होती है । 
ब्रज के प्रमुख दर्शनीय स्थल

मथुरा– मथुरा के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में श्रीकृष्ण जन्मस्थान की महत्ता सर्वोपरि है । सैकड़ों वर्षों तक यह स्थान विधर्मी आक्रमणकारियों द्वारा ध्वस्त किये जाने के कारण खण्डहररूप में रहा । देश के स्वतन्त्र होने के बाद श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा-संस्थान संस्था द्वारा इस स्थल का जीर्णोद्धार किया गया और आज यह विश्वभर के सनातन हिन्दूधर्मी श्रद्धालुओं के आकर्षण व श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है । 

श्रीकृष्ण जन्मस्थान के अलावा मथुरा नगर में विश्रामघाट तथा श्रीद्वारकाधीश मन्दिर भी प्रमुख हैं । विश्रामघाट यमुना-तट का प्रधान घाट है । ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण-बलराम ने वंâस को मारकर इसी स्थान पर विश्राम लिया था । विश्रामघाट पर प्रतिदिन प्रात: व सायं श्रीयमुनाजी की भव्य आरती दर्शनीय होती है । यमुनाजी के साथ उनके भाई यमराज का मन्दिर भी इसी घाट पर है । भारत में कदाचित् यमराज का यह अकेला मन्दिर है । कार्तिक मास में यमद्वितीया का प्रसिद्ध स्नान इसी घाट पर होता है । ब्रज-परिक्रमा तथा मथुरा-परिक्रमा की शुरूआत इसी घाट से होती है । 

विश्रामघाट के निकट ही श्रीद्वारकाधीश का भव्य मन्दिर है । यह नगर का प्रधान मन्दिर है । इसका निर्माण सन् १८१५ में ग्वालियर राज्य के खजांची सेठ गोकुलदास पारीख ने करवाया था । यहाँ श्रावण मास में सोने चाँदी के हिण्डोले, रंग-बिरंगी घटाएँ तथा दीपावली पर जवाहरात का भव्य शृंगार देखने योग्य होता है । 

उपरोक्त के अतिरिक्त मथुरा नगर में अन्य भी कई दर्शनीय मन्दिर हैं । इनमें मथुरा-वृन्दावन-मार्ग पर श्रीगायत्री-तपोभूमि और गीता-मन्दिर (बिरला मन्दिर)  भी दर्शनीय हैं । नगर के मुख्य बाजार– छत्ता बाजार में मथुरानाथ, दाऊजी, किशोरीरमण, विजय गोविन्द, गोवर्धननाथ, कन्हैयालाल, लक्ष्मीनारायण, अन्नपूर्णाजी, वंâसनिवंâदन आदि मन्दिर उल्लेखनीय हैं । घीयामण्डी में श्रीराम-मन्दिर, चौक बाजार में श्रीदाऊजी-मन्दिर तथा डोरी बाजार में श्रीलक्ष्मीजी का मन्दिर भी दर्शनीय हैं । वैसे तो मथुरा के गली-मोहल्लों में अनेक प्राचीन एवं पौराणिक महत्व के मन्दिर हैं, जिनका वर्णन इस लघु पुस्तिका में विस्तार-भय से नहीं किया गया है । अन्य बहुत-से मन्दिरों की चर्चा परिक्रमा- मार्ग के संदर्भ में की गई है । 

वृन्दावन– भगवान श्रीकृष्ण की नित्यरासलीला-स्थली वृन्दावन मथुरा से दस किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित है । वृन्दावन दिव्य प्रेम की भूमि है । यहाँ के कण-कण में श्रीराधा- नाम की गूँज सुनाई पड़ती है । वृन्दावन में प्रवेश करने से पूर्व मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर संत पागलबाबा का बनवाया हुआ सपेâद संगमरमर का सात मंजिला मन्दिर है । जिसमें अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ व झाकियाँ हैं ।

वृन्दावन का प्रधान मन्दिर श्रीबाँकेबिहारीजी का मन्दिर है । इस मन्दिर में विराजमान बिहारीजी का श्रीविग्रह स्वामी हरिदासजी की तपस्थली निधिवन से प्रकट हुआ था । इस मन्दिर का निर्माण अकबर के शासनकाल में सन् १५४३ के आसपास हुआ था । इस काल में ही वृन्दावन के अन्य कई मन्दिरों का निर्माण भी हुआ था । इनमें श्रीगोविन्ददेवजी का मन्दिर, श्रीमदनमोहनजी का मन्दिर, श्रीगोपीनाथजी का मन्दिर, श्रीराधाबल्लभजी का मन्दिर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं । यह सभी वृन्दावन के प्राचीन मन्दिरों में गिने जाते हैं ।

वृन्दावन के अन्य दर्शनीय मन्दिरों में चैतन्य- सम्प्रदाय के गोपाल भट्ट द्वारा संस्थापित श्रीराधारमणजी का मन्दिर, हरिदास सम्प्रदाय के आचार्य रसिकदासजी द्वारा स्थापित श्रीरसिकबिहारीजी का मन्दिर भी उल्लेखनीय हैं । 

वृन्दावन के विशालतम मन्दिरों में श्रीरंगजी का मन्दिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है । इस मन्दिर का निर्माण सन् १८४५ में स्वामी रंगाचारीजी की प्रेरणा से हैदराबाद के सेठ परमसुखदास द्वारा करवाया गया था । इस मन्दिर के बाहर सात परकोटे तथा इसके प्रांगण में सोने का विशाल खम्भा है । दक्षिण भारतीय शैली पर बने इस मन्दिर में सेवा-पूजा भी दाक्षिणात्य पद्धति से होती है । इसी मन्दिर के पीछे काँच का मन्दिर भी दर्शनीय है । 

रंगजी मन्दिर के निकट स्वामी बलदेवाचार्य द्वारा स्थापित  गोदाविहार मन्दिर भी दर्शनीय है । कला की दृष्टि से यह मन्दिर अपने आप में अद्भुत है । इसमें लघुभारत की झाँकी देखने को मिलती है । इस मन्दिर में लगभग ३०० देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ विद्यमान हैं । यहीं पर निकट में श्रीकृष्ण-कालीपीठ में श्रीकृष्ण-काली का अद्भुत दर्शन है । सम्पूर्ण भारत में श्रीकृष्ण  के कालीस्वरूप की यह अकेली प्रतिमा है । रंगजी मन्दिर के पाश्र्व में ज्ञानगुदड़ी के निकट भगवती कात्यायनी देवी का मन्दिर भी दर्शनीय है । यह सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है । 

सन् १८६७ में निर्मित श्रीकृष्णचन्द्र सिंह उर्पâ लालाबाबू का मन्दिर, जो लालाबाबू के मन्दिर के नाम से ही विख्यात है– उल्लेखनीय है । जयपुर के राजा जयसिंह का बनवाया हुआ जयपुर मन्दिर, तड़ास के राजा बनमाली दास का बनवाया हुआ जमाई बाबू का मन्दिर— आदि कई ऐसे मन्दिर वृन्दावन में अपनी विशिष्ट महत्ता रखते हैं, जिनका निर्माण भारत के राजे-रजवाड़ों तथा रियासतदारों द्वारा करवाया गया था । 

वर्तमान समय में भी वृन्दावन में नवीन मन्दिरों के निर्माण का सिलसिला जारी है । इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध और यात्रियों के आकर्षण का केन्द्र है– श्रीकृष्ण-बलराम-मन्दिर । यहाँ विदेशी कृष्ण-भक्तों द्वारा बड़े ही भक्तिभाव और चाव से भगवान की सेवा-पूजा की जाती है । इसके निकट ही कुछ दूरी पर कृपालुजी महाराज का नवनिर्मित मन्दिर भी शीघ्र ही दर्शनार्थियों के लिये खुलने की प्रतीक्षा में है । वृन्दावन के अन्य भागों में भी  कई नये और दर्शनीय मन्दिर पिछले ५० वर्षो में निर्मित हुए हैं । इनमें श्रीबाँकेबिहारीजी के निकट प्रसिद्ध भागवत-कथा-वाचक एवं भजन-गायक श्रीमृदुलकृष्णजी द्वारा बनवाया गया श्रीराधासनेहबिहारीजी का मन्दिर भी अच्छी लोकप्रियता हासिल कर रहा है । 

वृन्दावन के नूतन-पुरातन मन्दिरों के हुजूम में यहाँ के प्राचीन महत्त्व के लीला-स्थलोंं और मन्दिरों को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता । इनमें स्वामी हरिदासजी की साधना-स्थली निधिवन, श्रीराधाकृष्ण की नित्यलीला-स्थली सेवावुंâज, रासस्थली वशीवट, विरक्त महात्माओं की भजनस्थली ज्ञानगुदड़ी एवं तटीय स्थान, किशोरवन, कालीदह, चीरघाट, सवामन शालिग्राम, गोपेश्वर महादेव, वनखंडेश्वर महादेव आदि ऐसे स्थान हैं, जिनके दर्शन के बिना वृन्दावन की यात्रा को सफल नहीं कहा जा सकता ।  

वृन्दावन के असंख्य मन्दिरों का वर्णन सम्पूर्ण रूप से करने के लिए एक वृहद् ग्रन्थ की रचना अपेक्षित है । स्थान-संकोच के कारण कतिपय मन्दिरों का जिक्र कदाचित् न हो पाया हो, तो हम उसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं । 

सम्प्रदाय के गोपाल भट्ट द्वारा संस्थापित श्रीराधारमणजी का मन्दिर, हरिदास सम्प्रदाय के आचार्य रसिकदासजी द्वारा स्थापित श्रीरसिकबिहारीजी का मन्दिर भी उल्लेखनीय हैं । 

वृन्दावन के विशालतम मन्दिरों में श्रीरंगजी का मन्दिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है । इस मन्दिर का निर्माण सन् १८४५ में स्वामी रंगाचारीजी की प्रेरणा से हैदराबाद के सेठ परमसुखदास द्वारा करवाया गया था । इस मन्दिर के बाहर सात परकोटे तथा इसके प्रांगण में सोने का विशाल खम्भा है । दक्षिण भारतीय शैली पर बने इस मन्दिर में सेवा-पूजा भी दाक्षिणात्य पद्धति से होती है । इसी मन्दिर के पीछे काँच का मन्दिर भी दर्शनीय है । 

रंगजी मन्दिर के निकट स्वामी बलदेवाचार्य द्वारा स्थापित  गोदाविहार मन्दिर भी दर्शनीय है । कला की दृष्टि से यह मन्दिर अपने आप में अद्भुत है । इसमें लघुभारत की झाँकी देखने को मिलती है । इस मन्दिर में लगभग ३०० देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ विद्यमान हैं । यहीं पर निकट में श्रीकृष्ण-कालीपीठ में श्रीकृष्ण-काली का अद्भुत दर्शन है । सम्पूर्ण भारत में श्रीकृष्ण  के कालीस्वरूप की यह अकेली प्रतिमा है । रंगजी मन्दिर के पाश्र्व में ज्ञानगुदड़ी के निकट भगवती कात्यायनी देवी का मन्दिर भी दर्शनीय है । यह सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है । 

सन् १८६७ में निर्मित श्रीकृष्णचन्द्र सिंह उर्फ लालाबाबू का मन्दिर, जो लालाबाबू के मन्दिर के नाम से ही विख्यात है– उल्लेखनीय है । जयपुर के राजा जयसिंह का बनवाया हुआ जयपुर मन्दिर, तड़ास के राजा बनमाली दास का बनवाया हुआ जमाई बाबू का मन्दिर— आदि कई ऐसे मन्दिर वृन्दावन में अपनी विशिष्ट महत्ता रखते हैं, जिनका निर्माण भारत के राजे-रजवाड़ों तथा रियासतदारों द्वारा करवाया गया था । 

वर्तमान समय में भी वृन्दावन में नवीन मन्दिरों के निर्माण का सिलसिला जारी है । इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध और यात्रियों के आकर्षण का केन्द्र है– श्रीकृष्ण-बलराम-मन्दिर । यहाँ विदेशी कृष्ण-भक्तों द्वारा बड़े ही भक्तिभाव और चाव से भगवान की सेवा-पूजा की जाती है । इसके निकट ही कुछ दूरी पर कृपालुजी महाराज का नवनिर्मित मन्दिर भी शीघ्र ही दर्शनार्थियों के लिये खुलने की प्रतीक्षा में है । वृन्दावन के अन्य भागों में भी  कई नये और दर्शनीय मन्दिर पिछले ५० वर्षो में निर्मित हुए हैं । इनमें श्रीबाँकेबिहारीजी के निकट प्रसिद्ध भागवत-कथा-वाचक एवं भजन-गायक श्रीमृदुलकृष्णजी द्वारा बनवाया गया श्रीराधासनेहबिहारीजी का मन्दिर भी अच्छी लोकप्रियता हासिल कर रहा है । 

वृन्दावन के नूतन-पुरातन मन्दिरों के हुजूम में यहाँ के प्राचीन महत्त्व के लीला-स्थलोंं और मन्दिरों को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता । इनमें स्वामी हरिदासजी की साधना-स्थली निधिवन, श्रीराधाकृष्ण की नित्यलीला-स्थली सेवावुंâज, रासस्थली वशीवट, विरक्त महात्माओं की भजनस्थली ज्ञानगुदड़ी एवं तटीय स्थान, किशोरवन, कालीदह, चीरघाट, सवामन शालिग्राम, गोपेश्वर महादेव, वनखंडेश्वर महादेव आदि ऐसे स्थान हैं, जिनके दर्शन के बिना वृन्दावन की यात्रा को सफल नहीं कहा जा सकता ।  

वृन्दावन के असंख्य मन्दिरों का वर्णन सम्पूर्ण रूप से करने के लिए एक वृहद् ग्रन्थ की रचना अपेक्षित है । स्थान-संकोच के कारण कतिपय मन्दिरों का जिक्र कदाचित् न हो पाया हो, तो हम उसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं । 


गोकुल– मथुरा से १० किमी. दूर दक्षिण-पूर्व में यमुनापार मथुरा-सादाबाद-मार्ग पर स्थित भगवान श्रीकृष्ण की शिशु-लीला-भूमि तथा पुष्टि-सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र है । इसे वृहद्वन भी कहा जाता है । यहाँ यमुनाजी के तट पर नंदबाबा का किला, ठकुरानी घाट, श्रीमहाप्रभुजी की बैठवेंâ, श्रीगोकुलनाथजी का मन्दिर, सात स्वरूपों की बैठवेंâ, नंद-चौक में श्रीदाऊजी का मन्दिर तथा कस्बे के प्रवेश-मार्ग पर पतित-पावन कुण्ड दर्शनीय हैं । गोकुल के समीप ही संत-महात्माओं की तप:स्थली रमणरेती का र्कािष्ण-आश्रम तथा रसखान-समाधि आदि अनेक दर्शनीय स्थान हैं ।

महावन– गोकुल से पूर्व-दिशा में लगभग २ कि.मी. दूर स्थित महावन को ‘पुरानी गोकुल’ भी कहा जाता है । यहाँ का प्राचीन चौरासी खम्भा मन्दिर, नंदेश्वर महादेव, शकटासुर- पूतना-तृणावर्त के संहार-स्थल, योगमाया-मन्दिर तथा मथुरानाथ और गोकुलनाथ आदि के मन्दिर दर्शनीय हैं ।

बलदेव– महावन से लगभग १० कि.मी. पूर्व में मथुरा-सादाबाद-मार्ग पर स्थित यह ब्रजवासियों का सर्वाधिक मान्य तीर्थ है । यहाँ का प्रसिद्ध बलदेव-मंदिर लगभग २५३ वर्ष पूर्व दिल्ली के सेठ श्यामदास द्वारा बनवाया गया था । इस स्थान के निकट स्थित क्षीरसागर-कुण्ड से प्रकट श्रीबलदेव-प्रतिमा को गोस्वामी  गोकुलनाथजी द्वारा पहले ही स्थापित किया जा चुका था । यहाँ श्रीबलरामजी को माखन-मिश्री तथा खीर का भोग हँडिया में भर-भरकर आरोगाया जाता है । इस गाँव के पूर्व में रेवती कुण्ड, पश्चिम में क्षीरसागर, उत्तर में मूर्तिकुण्ड तथा दक्षिण में रेणुकाकुण्ड विद्यमान हैं ।

रावल– गोकुल की परिक्रमा-परिधि में उत्तर दिशा में स्थित श्रीराधा का जन्म-स्थान कहा जाता है । यह श्रीवृषभानुजी (श्रीराधाजी के पिता) का निवास-स्थान है । पुष्टि-मार्ग के भक्त-कवियों द्वारा अनेकों पदों में रावल को ही श्रीराधा का जन्मस्थल स्वीकार किया गया है ।

गोवर्धन– मथुरा से २१ कि.मी पश्चिम में राजस्थान सीमा पर स्थित गोवर्धन पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण का ही साकार विग्रह माना जाता है । श्रीगोवर्धन-गिरि-परिक्रमा (७ कोस) का अत्यधिक माहात्म्य है । यहाँ मानसी-गंगा, हरदेवजी मनसा देवी, दानघाटी एवं मुखारबिंद सहित भरतपुर राजघराने की बनवाई हुई पत्थर की नक्काशीदार छतरी और बुर्जियाँ अत्यधिक चित्ताकर्षक हैं । पुष्टिमार्गीय वैष्णवों का प्रधान श्रद्धा- केन्द्र जतीपुरा यहाँ से ३ कि.मी. दक्षिण दिशा में स्थित है । उत्तर में लगभग इतनी ही दूरी पर प्रसिद्ध राधाकुण्ड-कृष्णकुण्ड नाम के संपृक्त-सरोवर हैं । राधाकुण्ड गौड़ीय भक्तों व साधुओं की एकान्त साधना-स्थली है । गोवर्धन-परिक्रमा-मार्ग के अन्य पवित्र दर्शनीय-स्थलों में गोविन्द कुण्ड एवं श्रीमहाप्रभुजी की बैठक (आन्यौर गाँव में), नवल-अप्सरा कुण्ड, उद्धव कुण्ड, नारद कुण्ड और कुसुम सरोवर आदि प्रमुख हैं ।

बरसाना— गोवर्धन से २१ कि.मी. पश्चिमोत्तर दिशा में श्रीराधाजी का अनुपम धाम ‘बरसाना’ नाम से विख्यात है । जगत्पिता ब्रह्मा के विग्रहस्वरूप गौरवर्णी पर्वत के ऊपर श्रीराधाजी का भव्य मन्दिर है । जयपुर राजघराने द्वारा निर्मित एक अन्य मन्दिर भी इस पर्वत के ऊपर थोड़े ही फासले पर है, जिसकी भव्यता भी दर्शनीय है । फाल्गुन में बरसाने की प्रसिद्ध लठामार होली शुक्लपक्ष की नवमी के दिन होती है । बरसाने के दर्शनीय स्थलों में दानगढ़, मानगढ़, साँकरीखोर, श्रीवृषभानु-मन्दिर, अष्टसखी-मन्दिर, भानोखर, कीर्तिकुण्ड, मुक्ताकुण्ड, पीरी पोखर आदि तो हैं ही– श्रीराधाकृष्ण के प्रथम मिलन-स्थल संकेतवन की दूरी भी यहाँ से सिर्पâ २ कि.मी. है । 
नन्दगाँव– भगवान श्रीकृष्ण-बलराम यहाँ शिव-स्वरूप-नीलवर्णी पर्वत के ऊपर यशोदा मैया, नन्द बाबा और रोहिणी माँ के साथ विराजमान हैं । नन्दगाँव मथुरा से ५० कि.मी. तथा बरसाना से लगभग ८ कि.मी. की दूरी पर स्थित है । यहाँ पहाड़ी पर नन्द-मन्दिर, पान-सरोवर, श्रीबल्लभाचार्यजी की बैठक, श्रीसनातन गोस्वामी की कुटिया, कृष्णकुण्ड, आशेश्वर महादेव, जल-बिहार, छी-छी कुण्ड, छछिहारी देवी, नन्दपोखरा, यशोदा- कुण्ड, नृसिंहनाथ, आसेश्वर महादेव, यशोदानन्दन, बिहारीजी, चतुरानागा, गेंदोखर, कदम्बवन आदि भगवान बालकृष्ण की क्रीड़ाओं के स्मृति स्थल और मन्दिर हैं ।











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