गुह्य-तंत्रोपासना


तंत्र-कुंजिका सीरीज: १

गुह्य-तंत्रोपासना

(भैरवी-चक्र एवं काली सहस्रनाम- सहित)



लेखक:
प्रेमी मथुरिया
(प्रेमी बाबा)



प्रकाशक:
लोकसेवा प्रतिष्ठान
उषा किरन प्लाजा,
डेम्पियर नगर, मथुरा
मोबाइल: 09415383655, 09359526868

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साधना-सूत्र

·         गुह्य तन्त्रोपासना और इसकी सफलता इसकी गोपनीयता में निहित है । अत: इसके सूत्रों और      सफलताओं को गोपनीय रखना ही श्रेयस्कर है । इन्हें  प्रकट करने से सिद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं ।

·         इस रहस्यमयी उपासना को गुरु-निर्देश तथा गुरु-संरक्षा के बिना कदापि नहीं करना चाहिए ।

·         इस उपासना का आधार शरीर-तन्त्र हैक्योंकि शक्ति-सम्पन्न ईश्वर आनन्दमय है और आनन्द का निवास शरीर में  है ।

·         शारीरिकमानसिक और भावनात्मक संयम ही गुह्य तन्त्रोपासना में सफलता प्राप्त करने की कुंजी है ।

·         सृजन-शक्तिआत्म-शक्ति और वैभव-शक्ति — तीनों की उपलब्धि का स्रोत योनि-देवी ही हैं । अत: जिस घर में योनिस्वरूपा मातृ-शक्ति अप्रसन्न रहती हैवहाँ अभावदुर्बलता और दरिद्रता का स्थायी निवास होता है ।






लिङ्गाष्टकम्

ब्रह्ममुरारि-सुरार्चित  -लिङ्गं निर्मल-भासित-शोभित-लिङ्गम् ।
जन्मज-दुःख-विनाशक-लिङ्गं तत्प्रणमामि सदा शिवलिङ्गम् ।।१।।

देवमुनि-प्रवरार्चित-लिङ्गं     कामदहं    करुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्प-विनाशन-लिङ्गं तत्प्रणमामि   सदा  शिवलिङ्गम् ।।२।।

सर्वसुगन्धि - सुलेपित-लिङ्गं बुद्धिविवर्धन-कारण-लिङ्गम् ।
सिद्धसुरा-ऽसुरवन्दित-लिङ्गं तत्प्रणमामि सदा शिवलिङ्गम् ।।३।।

कनक-महामणि-भूषित-लिङ्गं फणिपति-वेष्टित-शोभितलिङ्गम् ।
दक्ष-सुयज्ञ-विनाशक-लिङ्गं तत्प्रणमामि सदा शिवलिङ्गम् ।।४।।

कुंकुम-चन्दनलेपितलिङ्गं   पंकज-हार-सुशोभित-लिङ्गम् ।
सञ्चित-पाप-विनाशन-लिङ्गं तत्प्रणमामि सदा शिवलिङ्गम् ।।५।।

देवगणार्चित-सेवित-लिङ्गं     भावैर्भक्तिभिरैव  च     लिङ्गम् ।
दिनकरकोटि-प्रभाकर-लिङ्गं तत्प्रणमामि सदा शिवलिङ्गम् ।।६।।

अष्टदलोपरि-वेष्टित-लिङ्गं     सर्वसमुद्भव-कारण-लिङ्गम् ।
अष्टदरिद्र-विनाशित-लिङ्गं  तत्प्रणमामि  सदा  शिवलिङ्गम् ।।७।।

सुरगुरु-सुरवर-पूजित-लिङ्गं सुर-वन-पुष्प-सदार्चित लिङ्गम् ।
परात्परं  परमात्मकलिङ्गं   तत्प्रणमामि   सदा   शिवलिङ्गम् ।।८।।

लिङ्गाष्टकमिदं      पुण्यं       य:      पठैच्छिव - सन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति          शिवेन         सह       मोदते ।।९।।




उपोदघात
साधना और संयम एक दूसरे से अभिन्न हैं । मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार के सहित स्वयं को साधना ही वास्तविक साधना’ है । सधी हुई वृत्तियों का स्वामी ही सच्चा साधक है । असंयमित और असाध्य चेष्टाओं से जीवन बिखर जाता हैजबकि संयमित साधना से जीवन निखर जाता है ।
तंत्र-शास्त्रों में वर्णित गुह्य (गोपनीय) साधनाएँ साधक के संयमधैर्य और गुरु-निष्ठा की अग्नि-परीक्षा-सरीखी हैं । तंत्र के अनेकानेक भेद होने के कारण साधकों की चित्तवृत्ति के अनुसार साधना-मार्ग चुनने में गुरु ही सहायक होते हैं । गुरु-निष्ठा के बिना कोई भी तांत्रिक साधना सिद्ध नहीं हो सकती ।
तंत्र-विद्या के गूढ़ रहस्यों को जाने बिनाउनका अनुभव किये बिना इसे पाखण्डियोंठगों और व्यभिचारियों का मार्ग कहना या समझना न केवल अज्ञानता हैबल्कि सृष्टि के आदिकत्र्ता भगवान् सदाशिव और आदिशक्ति महामाया की अवहेलना करने  जैसा है ।   
तन्त्र-विद्या में अनेक गोपनीय साधनाओं का भी विधान है । इनमें शव-साधनायोगिनी-साधना,यक्षिणी-साधना आदि अनेक गुप्त साधनाओं का उल्लेख मिलता है । उपासनासाधना की पूर्वभूमिका है । स्तुतिपाठ व मंत्र-जप उपासना के उपादान हैं ।
प्रस्तुत लघुपुस्तिका में अति गोपनीय भैरवी-साधना’ के बारे में विंâचित् चर्चा की गई है । पुस्तक में इस साधना के मूल तत्वोंकारकोंरहस्यमय मंत्रों व क्रियाओं का ़िजक्र नहीं किया गया हैबल्कि इसके जिज्ञासुओं के लिए स्तोत्र व सहस्रनाम का प्रकाशन किया गया है  । इनका पाठ गोपनीय हैक्योंकि  भगवान शिव ने इस विद्या को छिपाये रखने की आज्ञा दी है
प्रकाशात्सिद्धिहानि: स्यात् वामाचारगतौ प्रिये ।
अतोवामपथं    देवि    गोपयेन्मातृजारवत् ।।
इसी कारण ग्रंथों में भी इन गुप्त साधनाओं का अपूर्ण और सतही वर्णन मिलता है । रहस्य तोगुरुगम्य’  ही है । इसे प्रकट करने से सिद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं । तथापितंत्र-मार्ग के जिज्ञासुओं एवं उपासकों के प्रारंभिक मार्गदर्शन हेतु यह वुंâजिका महत्वपूर्ण सिद्ध होगी ।

                                                       –प्रेमी बाबा
तन्त्र की गुह्य-उपासनाएँ

सनातन धर्म में आगम (तंत्र) और निगम (वेद)– ये दोनों ही मार्ग ब्रह्मज्ञान की उपलब्धि कराने वाले माने गये हैं । दोनों ही मार्ग अनादि परम्परा-प्राप्त हैं । किन्तुकलियुग में आगम-मार्ग को अपनाये बिना सिद्धि प्राप्त नहीं की जा सकतीक्योंकि आगम तो सार्वर्विणक हैजबकि निगम त्रैवर्णिक यानी केवल द्विजातियों के लिए है । कहा गया है
     कलौ श्रुत्युक्त आचारस्त्रेतायां  स्मृति सम्भव: ।
द्वापरे  तु  पुराणोक्त कलौवागम   सम्भव: ।।

अर्थात् सतयुग में वैदिक आचारत्रेतायुग में  स्मृतिग्रन्थों में उपदिष्ट आचारद्वापरयुग में पुराणोक्त आचार तथा कलियुग में तंत्रोक्त आचार मान्य हैं ।

आगम-शास्त्रों की उत्पत्ति भगवान शिव से हुई है । भगवान शिव ने अपने पाँचों मुखों (सद्योजातवामदेवअघोरतत्पुरुष और ईशान) के द्वारा भगवती जगदम्बा पार्वती को तन्त्र-विद्या के जो उपदेश दिये– वही पूर्वदक्षिणपश्चिमउत्तर और ऊध्र्व नामक पाँच आम्नाय तन्त्रों के नाम से प्रचलित हुए । ये पंच-तन्त्र’ भगवान श्रीमन्नारायण वासुदेव को भी मान्य हैं

  आगतं शिव वक्त्रेभ्यो गतं च गिरिजा श्रुतौ ।
  मतञ्च     वासुदेवेन   आगम    संप्रवक्षते ।।
तन्त्र के मुख्यत: ६४ भेद माने गये हैं । इन सभी का आविर्भाव भगवान शिव से ही हुआ है । कुछ विद्वान् ६४ योगिनियों को तन्त्र के इन ६४ भेदों का आधार मानते हैं ।

तन्त्र-सिद्धि की परम्परा में कतिपय साधना-पद्धतियाँ बड़ी रहस्यमयी हैंजिन्हें प्रकट करना निषिद्ध माना गया है । इनके रहस्य को समझ पाना साधारण साधक के वश की बात नहीं हैबल्कि इससे उसके पथभ्रष्ट हो जाने की आशंका ही बनी रहती है । इन गुप्त एवं रहस्यमयी तन्त्र-साधना-पद्धतियों में दक्षिणाचारवामाचारसिद्धान्तकौलाचार आदि को उत्तरोत्तर उत्तम फलदायी माना गया है । किन्तुइनकी अनेकरूपता के कारण साधकों को श्रेष्ठ गुरु के निर्देश के बिना इन साधनाओं को नहीं करना चाहिए ।

योग और मोक्ष– साधकों के जीवन के ये दो मुख्य उद्देश्य होते हैं । जिन साधकों में योग की भावना प्रबल होती हैवह मन से मुक्ति की साधना नहीं कर सकते । क्योंकि उनका मन भोग में लिप्त रहेगाभले ही बाह्य रूप से वे विरक्त क्यों न हो जायँ ।  ऐसे साधकों को भोग से विरक्ति उत्पन्न होनी चाहिए । किन्तुभोग में  डूबकर उसके रहस्य को जाने बिना उससे विरक्ति होना सम्भव नहीं है । भोगों की नश्वरता और उनके अल्पस्थायित्व को समझे बिना उनसे निवृृत्ति और विरक्ति हो पाना नितान्त असम्भव है । अत: भोग में भी भक्ति-भाव आ जाय– इसके लिए देव’ और देवी’ के भाव को हृदय में स्थापित करते हुए– ‘पूजा ते विषयोपभोगरचना’– की भावना के अनुसार साधना करते हुए भोग के भौतिक भाव को भुलाकर उसके आध्यात्मिक और आधिदैविक भाव की ओर अग्रसर होना ही इन गुह्य साधनाओं का परम लक्ष्य है ।

बलपूर्वक मन को वैराग्य में लगाने का विपरीत प्रभाव हो सकता है । अत: गुरु के निर्देशानुसार मर्यादित विषयोपभोग करते हुए मन्त्र-जपध्यानपूजायोग आदि का अभ्यास करते रहना चाहिए । इस प्रकार के अभ्यास से साधक को आत्मानंद की अनुभूति और आत्मज्ञान की सहसा उपलब्धि हो जाती है । क्योंकि सत्-चित्-आनन्द– ये तीन ब्रह्म के स्वरूप हैंजो वास्तव में एक ही हैं । जहाँ भी आनन्द की अनुभूति हैवह ब्रह्म का ही रूप हैभले ही वह पूर्णरूप से स्पुâरित न हो ।

पूर्ण ब्रह्मानन्द और विषयानन्द– दोनों में अनन्तता और क्षणिकत्व का ही भेद है । निस्सन्देह बाह्य विषयानन्द तम है– मृत्यु हैकिन्तु उसकी अनुभूति करनी पड़ती है । उससे गुजरे बिना उसके प्रति अनादरअनिच्छाअस्थायित्व और नश्वरता का भाव नहीं उभर सकता;क्योंकि विषय स्वाभाविक रूप से रमणीय तो होते ही हैं । इसीलिए वामाचारी तन्त्र-साधकों की मान्यता है कि
आनन्दं ब्रह्मणोरूपं तच्च देहे व्यवस्थितम् ।

इस तथ्य को जानने के बाद ही तन्त्राचार्यों ने नग्न-ध्यानयोनि-पूजालिंगार्चनभैरवी-साधनाचक्र-पूजा और बङ्काौली जैसी गुह्य-साधना-पद्धतियों को स्वीकार किया है । सर्वप्रथम बौद्ध तान्त्रिकों की बङ्कायान शाखा द्वारा चीनाचार सम्बन्धी ग्रन्थों में इन गोपनीय साधनाओं को प्रकट किया गया । बाद में शाक्त-सम्प्रदाय के आचार्योें ने भी इन गुप्त साधनाओं का प्रकाश किया । फलस्वरूप पंच-मकार-साधना और वामाचार का प्रचलन हुआ ।

जगत के माता-पिता शिव-पार्वती के एकान्तिक संयोग और सत्संग के माध्यम से उद्भूत इन रहस्यमयी गुह्य साधनाओं का स्वरूप कालान्तर में विषयी और पाखण्डी लोगों की व्यभिचार-वृत्ति और काम-लोलुपता के कारण विकृत होता चला गया और तन्त्र की रहस्यमयी शक्तियों से अनभिज्ञ विलासी लोगों ने इसे कामोपभोग का माध्यम बना डाला और साधना की आड़ में अपनी दैहिक वासना की तृप्ति करने में लग गये ।
किन्तुयह बात साधकों का अनुभवजन्य सत्य है कि यदि काम-ऊर्जा का और काम-भाव का सही-सही प्रयोग किया जाय तो इससे ब्रह्मानन्द की प्राप्ति व ब्रह्म-साक्षात्कार सम्भव है । वास्तव में कामक्रोधलोभमोह आदि विकारों को संस्कारों में परिवर्तित करकेउनकी दिशा बदलकर उनके माध्यम से भगवत्प्राप्ति या मोक्ष-प्राप्ति सहजता से की जा सकती है । ये प्रयोग त्यागतपस्यायज्ञानुष्ठान आदि की अपेक्षा ज्यादा आसान हैंक्योंकि ये मानव की सहज वृत्तियों के अनुवूâल हैं ।

वाममार्गी तन्त्र-साधना में देह को साधना का मुख्य आधार माना गया है । देह में स्थित देव’ को उसकी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ जागृत रखने के लिए ध्यान की पद्धति साधना का प्रारम्भिक चरण है । भगवान से हमें यह शरीर प्राप्त हुआ हैअत: भगवान भी इस शरीर से ही प्राप्त होंगें– यह तार्विâक एवं स्वाभाविक सत्य है । देह पर संस्कारों और वासनाओं का आवरण विद्यमान रहता है । वासना’ शब्द की व्युत्पत्ति वसन’ शब्द से हुई है । वसन का अर्थ है– वस्त्र । वस्तुत: वस्त्र वासना को उद्दीप्त करते हैं । अत: वस्त्र-विहीन देह से आत्मस्वरूप का ध्यान करना साधक को वासना-मुक्त होने में सहायक होता है ।

इसी प्रकार योनि-पूजनलिंगार्चनभैरवी-साधनाचक्र-पूजा एवं बङ्काौली आदि गुप्त साधनाओं के द्वारा तन्त्र-मार्ग में मुक्ति के आनन्द का अनुभव प्राप्त करने की अन्यान्य विधियाँ भी वर्णित हैं । किन्तुये सभी विधियाँ योग्य व अनुभवी गुरु के सानिध्य में ही सम्पन्न हों,तभी फलदायी होती हैं । यहाँ हम तन्त्र-मार्ग की गुह्य साधनाओं में से केवल भैरवी-साधना पर थोड़ा-सा प्रकाश डालना चाहते हैं । अन्य गुह्य-साधनाओं पर चर्चा किसी अन्य पुस्तक या आलेख में करेंगे ।

दुर्गा सप्तशती में कहा गया है– ‘स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु’ । अर्थात् जगत् में जो कुछ है वह स्त्री-रूप ही हैअन्यथा निर्जीव है । तांत्रिक साधना में स्त्री को शक्ति का प्रतीक माना गया है । बिना स्त्री के यह साधना सिद्धिदायक नहीं मानी गयी । तंत्र-मार्ग में नारी का सम्मान सर्वोच्च हैपूजनीय है । यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’– इस मान्यता को तंत्र-मार्ग में वास्तविक प्रतिष्ठा प्राप्त है । रूढ़िवादी सोच के लोग जहाँ नारी को नरक का द्वारकहते आये हैंवहीं तंत्र-मार्ग में उसे देवी का स्वरूप मानते हुएपुरुष के बराबर का अधिकार दिया गया है । तंत्र-मार्ग में किसी भी कुल की नारी को हेय नहीं माना गया है ।

भैरवी-चक्र-पूजा में सम्मिलित साधक/साधिका की योग्यता के विषय में निर्वाण-तंत्रमें उल्लेख है
नात्राधिकार: सर्वेषां ब्रह्मज्ञान् साधकान् बिना ।
परब्रह्मोपासका:   ये    ब्रह्मज्ञा:  ब्रह्मतत्परा: ।।
शुद्धन्तकरणा:  शान्ता:  सर्व  प्राणिहते  रता: ।
निर्विकारा: निर्विकल्पा: दयाशीला: दृढ़व्रता: ।।
सत्यसंकल्पका: ब्रह्मास्त   एवात्राधिकारिण: ।।

अर्थात्चक्र-पूजा में सम्मिलित होने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को नहीं है । जो ब्रह्म को जानने वाला साधक हैउसके सिवाय इसमें कोई शामिल नहीं हो सकता । जो ब्रह्म के उपासक हैंजो ब्रह्म को जानते हैंजो ब्रह्म को पाने के लिए तत्पर हैंजिनके मन शुद्ध हैंजो शान्तचित्त हैंजो सब प्राणियों की भलाई में लगे रहते हैंजो विकार से रहित हैंजो दुविधा से रहित हैंजो दयावान् हैंजो प्रण पर दृढ़ रहने वाले हैंजो सच्चे संकल्प वाले हैंजो अपने को ब्रह्ममय मानते हैं– वे ही भैरवी-चक्र-पूजा के अधिकारी हैं ।

भैरवी-साधना का उद्देश्य मानव-देह में स्थित काम-ऊर्जा की आणविक शक्ति के माध्यम से संसार की विस्मृति और ब्रह्मानन्द की अनुभूति प्राप्त करना है । भैरवी-साधना कई चरणों में सम्पन्न होती है । प्रारम्भिक  चरण में इस साधना के साधक स्त्री-पुरुष एकान्त और सुुगन्धित वातावरण में निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के सामने बिना एक दूसरे को स्पर्श किए दो-तीन पुâट की दूरी पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर एक दूसरे की आँखों में टकटकी लगाते हुए गुरु-मन्त्र का जप करते हैं । निरन्तर ऐसा करते रहने से साधकों के अन्दर का काम-भाव ऊध्र्वगामी होकर दिव्य ऊर्जा के रूप में सहस्र- दल का भेदन करता है ।

इस साधना के दूसरे चरण में स्त्री-पुरुष साधक एक-दूसरे के अंग-प्रत्यंग का स्पर्श करते हुए ऊध्र्वगामी काम-भाव को स्थिर बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं । इस बीच गुरु-मन्त्र का जप निरन्तर होते रहना चाहिए । कामोद्दीपन की बाहरी क्रियाओं को करते हुए स्खलन से बचने के लिए भरपूर आत्मसंयम रखना चाहिए । गुरु-कृपा और गुरु-निर्देशन में साधना करने से संयम के सूत्र आसानी से समझे जा सकते  हैं ।

भैरवी-साधना के अन्तिम चरण में स्त्री-पुरुष साधकों द्वारा परस्पर सम-भोग (संभोग) की क्रिया सम्पन्न की जाती है । समान भावसमान श्रद्धासमान उत्साह और समान संयम की रीति से शारीरिक भोग की इस साधना को ही सम-भोग अथवा संभोग कहा गया है । यह क्रिया निरापदनिर्भीकनि:संकोचनिद्र्वन्द्व और निर्लज्ज भाव से  मंत्र-जप करते हुए सम्पन्न की जानी चाहिए । युगल-साधकों को पूर्ण आत्मसंयम बरतते हुए भरपूर प्रयास इस बात का करना चाहिए कि दोनों का स्खलन यथासंभव विलम्ब से और एकसाथ सम्पन्न हो । अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में भैरवी-चक्र-पूजा के दौरान यह आसानी से संभव हो पाता है ।

भैरवी-चक्र की अनेक विधियाँ बतायी गई हैंराजचक्रमहाचक्रदेवचक्रवीरचक्रपशुचक्र आदि । चक्र-भेद के अनुसार  इस साधना में स्त्री के जाति-वर्णपूजा-उपचारदेश-कालतथा फल-प्राप्ति में अन्तर आ जाता है । भैरवी चक्र-पूजा में सम्मिलित सभी उपासक एवं उपासिकाएँ भैरव और भैरवी स्वरूप हो जाते हैंक्योंकि उनका देहाभिमान गल जाता है और वे देह-भेद या जाति-भेद से ऊपर उठ जाते हैं । विंâतुचक्रार्चन के बाहर वर्णाश्रम-कर्म का पालन अवश्य करना चाहिए ।

भैरवी-चक्र-पूजा की सफलता पर एक अलौकिक अनुभव प्राप्त होता है । जैसे बिजली के दो तारों– फेस और न्यूटल– के टकराने से चिंगारी निकलती हैवैसे ही स्त्री-पुरुष दोनों के एकसाथ स्खलित होने से जो चरम-ऊर्जा उत्पन्न होती हैवह एक ही झटके में सहस्रदल का भेदन कर ब्रह्मानंद का साक्षात्कार करवा देने में सक्षम है ।  तंत्र-मार्ग में इसी को ब्रह्म-सुखकहा गया है
शक्ति-संगम संक्षोभात् शत्तäयावेशावसानिकम् ।
     यत्सुखं    ब्रह्मतत्त्वस्य   तत्सुखं      ब्रह्ममुच्यते ।।

अर्थात्शक्ति-संगम के आरम्भ से लेकर शक्ति-आवेश के अन्त तक जो ब्रह्मतत्व का सुख प्राप्त होता हैउसे ब्रह्म-सुख’ कहा जाता है । सहस्र-दल-भेदन करने के लिए आज तक जितने भी प्रयोग हुए हैंउन सभी प्रयोगों में यह प्रयोग सबसे अनूठा है ।

भैरवी-साधना सिद्ध होे जाने पर साधक को ब्रह्माण्ड में गूँज रहे दिव्य मंत्र सुनायी पड़ने लगते हैंदिव्य प्रकाश दिखने लगता है तथा साधक के मन में दीर्घ अवधि तक काम-वासना जागृत नहीं होती । साथ ही उसका मन शान्त व स्थिर हो जाता है तथा उसके चेहरे पर एक अलौकिक आभा झलकने लगती है ।

प्रत्येक साधना में कोई-न-कोई कठिनाई अवश्य होती है । भैरवी-साधना में भी जो सबसे बड़ी कठिनाई है– वह है अपने आप को काबू में रखना तथा साधक व साधिका का एक साथ स्खलित होना। निश्चय ही गुरु-कृपा और निरन्तर के अभ्यास से यह सम्भव हो पाता है ।

भैरवी-साधना प्रकारान्तर से शिव-शक्ति की आराधना ही है । शुद्ध और समर्पित भाव सेगुरु-आज्ञानुसार साधक यदि इसको आत्मसात् करें तो जीवन के परम लक्ष्य– ब्रह्मानंद की उपलब्धि उनके लिए सहज सम्भव हो जाती है ।

किन्तुकलिकाल के कराल-विकराल जंजाल में फंसे हुए मानव के लिए भैरवी-साधना के रहस्य को समझ पाना अति दुष्कर है । यंत्रवत् दिनचर्या व्यतीत करने वाले तथा भोगों की लालसा में रोगों को पालने वाले आधुनिक जीवन-शैली के दास भला इस दैवीय साधना के परिणामों से वैâसे लाभान्वित हो सकते हैं इसके लिए शास्त्र और गुरु-निष्ठा के साथ-साथ गहन आत्मविश्वास भी आवश्यक है ।

प्रस्तुत कुंजिका में उल्लिखित स्तोत्र एवं सहस्रनाम के नित्य-पाठ से साधक की निष्ठा निरंतर पुष्ट होती जाती है और उसके ह्य्दय में आत्मस्वरूप का प्रकाश जागृत होने लगता है । साधना-पथ पर आरूढ़ होने के लिए यही तो चाहिए !

काली-रहस्य
भैरव-तन्त्र’ के अनुसार साधक को अपनी साधना की सम्पूर्णत: निर्विघ्न सिद्धि के निमित्त कालिका देवी की उपासना करना अपरिहार्य है । भगवती काली ही तंत्रों के प्रवर्तक भगवान सदाशिव की आह्लादनी शक्ति हैं । कालिका देवी के कृपा-कटाक्ष बिना अघोरेश्वर शिव भी साधक को उसका वांछित वर देने में असमर्थ हो जाते हैं ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण’ (गणपति खण्ड) में परशुरामजी द्वारा शिवजी की आज्ञा से कालिका देवी को प्रसन्न करने हेतु बार-बार स्तुति करने का वर्णन मिलता है । शिवजी द्वारा प्रदत्तकालिका सहस्रनाम’ पूर्णत: सिद्ध है । इसका पाठ करने के लिए पूजनहवनन्यासप्राणायाम,ध्यानभूत-शुद्धिजप आदि की कोई आवश्यकता नहीं है । भगवान सदाशिव ने परशुरामजी से इस पाठ के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा है कि इस पाठ को करने से साधक में प्रबल आकर्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती हैउसके कार्य स्वत: सिद्ध होते जाते हैंउसके शत्रुगण हतबुद्धि हो जाते हैं तथा उसके सौभाग्य का उदय होता है ।

कालिका-सहस्रनाम’ का पाठ करने की अनेक गुप्त विधियाँ हैंजो विभिन्न कामनाओं के अनुसार पृथव्â-पृथव्â हैं और गुरु-परम्परा प्राप्त हैं । इस चमत्कारी एवं स्वयंसिद्ध काली-पाठको रात्रि में दस से दो बजे के मध्य नग्न अवस्था मेंबालों को बिखराकर
तथा कम्बल पर बैठकर करने का विधान है ।


काली-सहस्रनाम
श्मशान-कालिका काली भद्रकाली कपालिनी ।
गुह्य-काली महाकाली कुरु-कुल्ला  विरोधिनी ।।१।।

कालिका काल-रात्रिश्च  महा-काल-नितम्बिनी ।
काल-भैरव-भार्या  च  कुल-वत्र्म-प्रकाशिनी  ।।२।।

कामदा कामिनीया कन्या कमनीय-स्वरूपिणी ।
कस्तूरी-रस-लिप्ताङ्गी      कुञ्जरेश्वर-गामिनी।।३।।

ककार-वर्ण-सर्वाङ्गी  कामिनी  काम-सुन्दरी   ।
कामात्र्ता  काम-रूपा च  काम-धेनुु: कलावती ।।४।।

कान्ता काम-स्वरूपा च कामाख्या कुल-कामिनी ।
कुलीना  कुल-वत्यम्बा  दुर्गा  दुर्गति-नाशिनी ।।५।।

कौमारी  कुलजा कृष्णा  कृष्ण-देहा कृशोदरी ।
कृशाङ्गी कुलाशाङ्गी च क्रीज्ररी कमला कला ।।६।।

करालास्य  कराली  च   कुल-कांतापराजिता ।
उग्रा  उग्र-प्रभा  दीप्ता विप्र-चित्ता   महा-बला ।।७।।

नीला  घना मेघ-नाद्रा मात्रा  मुद्रा  मिताऽमिता ।
ब्राह्मी  नारायणी भद्रा  सुभद्रा   भक्त-वत्सला ।।८।।

माहेश्वरी  च चामुण्डा  वाराही    नारसिंहिका ।
वङ्कांगी वङ्का-कंकाली नृ-मुण्ड-स्रग्विणी शिवा ।।९।।

मालिनी    नर-मुण्डाली-गलद्रक्त-विभूषणा ।
रक्त-चन्दन-सिक्ताङ्गी   सिंदूरारुण-मस्तका ।।१०।।

घोर-रूपा  घोर-दंष्ट्रा  घोरा  घोर-तरा शुभा ।
महा-दंष्ट्रा  महा-माया  सुदन्ती  युग-दन्तुरा ।।११।।

सुलोचना  विरूपाक्षी विशालाक्षी त्रिलोचना ।
शारदेन्दु-प्रसन्नस्या     स्पुâरत्-स्मेराम्बुजेक्षणा  ।।१२।।

अट्टहासा प्रफुल्लास्या स्मेर-वक्त्रा  सुभाषिणी ।
प्रफुल्ल-पद्म-वदना स्मितास्या  प्रिय-भाषिणी ।।१३।।

कोटराक्षी  कुल-श्रेष्ठा   महती बहु-भाषिणी ।
सुमति:   मतिश्चण्डा   चण्ड-मुण्डाति-वेगिनी ।।१४।।

प्रचण्डा चण्डिका चण्डी चर्चिका चण्ड-वेगिनी  ।
सुकेशी  मुक्त-केशी च दीर्घ-केशी  महा-कचा ।।१५।।

पे्रत-देही-कर्ण-पूरा    प्रेत-पाणि-सुमेखला ।
प्रेतासना   प्रिय-प्रेता    प्रेत-भूमि-कृतालया ।।१६।।

श्मशान-वासिनी पुण्या पुण्यदा  कुल-पण्डिता ।
पुण्यालया पुण्य-देहा पुण्य-श्लोका  च पावनी ।।१७।।

पूता  पवित्रा  परमा   परा  पुण्य-विभूषणा ।
पुण्य-नाम्नी  भीति-हरा वरदा खङ्ग-पाशिनी ।।१८।।

नृ-मुण्ड-हस्ता शस्त्रा च छिन्नमस्ता सुनासिका ।
दक्षिणा श्यामला श्यामा शांता पीनोन्नत-स्तनी ।।१९।।

दिगम्बरा घोर-रावा सृक्कान्ता-रक्त-वाहिनी ।
महा-रावा  शिवा संज्ञा  नि:संगा  मदनातुरा  ।।२०।।

मत्ता  प्रमत्ता  मदना  सुधा-सिन्धु-निवासिनी  ।
अति-मत्ता  महा-मत्ता  सर्वाकर्षण-कारिणी ।।२१।।

गीत-प्रिया   वाद्य-रता  प्रेत-नृत्य-परायणा ।
चतुर्भुजा  दश-भुजा  अष्टादश-भुजा   तथा  ।।२२।।

कात्यायनी   जगन्माता    जगती-परमेश्वरी  ।
जगद्-बन्धुर्जगद्धात्री    जगदानन्द-कारिणी   ।।२३।।

जगज्जीव-मयी हेम-वती महामाया महा-लया ।
नाग-यज्ञोपवीताङ्गी  नागिनी  नाग-शायनी   ।।२४।।

नाग-कन्या  देव-कन्या  गान्धारी किन्नरेश्वरी ।
मोह-रात्री  महा-रात्री  दरुणाभा   सुरासुरी ।।२५।।

विद्या-धरी   वसु-मती यक्षिणी   योगिनी जरा ।
राक्षसी  डाकिनी  वेद-मयी   वेद-विभूषणा ।।२६।।

श्रुति-स्मृतिर्महा-विद्या   गुह्य-विद्या   पुरातनी ।
चिंताऽचिंता स्वधा स्वाहा निद्रा तन्द्रा च पार्वती ।।२७।।

अर्पणा निश्चला  लीला  सर्व-विद्या-तपस्विनी ।
गङ्गा काशी शची सीता सती सत्य-परायणा ।।२८।।

नीति:  सुनीति:  सुरुचिस्तुष्टि:  पुष्टिर्धृति: क्षमा ।
वाणी बुद्धिर्महा-लक्ष्मी  लक्ष्मीर्नील-सरस्वती ।।२९।।
स्रोतस्वती  स्रोत-वती  मातङ्गी  विजया  जया ।
नदी सिन्धु: सर्व-मयी तारा शून्य निवासिनी ।।३०।।

शुद्धा  तरंगिणी  मेधा  शाकिनी  बहु-रूपिणी ।
सदानन्द-मयी  सत्या   सर्वानन्द-स्वरूपणि  ।।३१।।

स्थूला  सूक्ष्मा  सूक्ष्म-तरा  भगवत्यनुरूपिणी ।
परमार्थ-स्वरूपा  च  चिदानन्द-स्वरूपिणी  ।।३२।।

सुनन्दा नन्दिनी स्तुत्या स्तवनीया स्वभाविनी  ।
रंकिणी टंकिणी चित्रा विचित्रा चित्र-रूपिणी ।।३३।।

पद्मा  पद्मालया  पद्म-मुखी  पद्म-विभूषणा  ।
शाकिनी हाकिनी क्षान्ता राकिणी रुधिर-प्रिया ।।३४।।

भ्रान्तिर्भवानी  रुद्राणी  मृडानी  शत्रु-मर्दिनी  ।
उपेन्द्राणी महेशानी ज्योत्स्ना चन्द्र-स्वरूपिणी ।।३५।।

सूय्र्यात्मिका रुद्र-पत्नी रौद्री स्त्री प्रकृति: पुमान् ।
शक्ति: सूक्तिर्मति-मती भक्तिर्मुक्ति: पति-व्रता ।।३६।।

सर्वेश्वरी  सर्व-माता  सर्वाणी  हर-वल्लभा ।
सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भाव्या भव्या भयापहा ।।३७।।

कर्त्री हर्त्री  पालयित्री  शर्वरी  तामसी  दया ।
तमिस्रा यामिनीस्था न स्थिरा धीरा तपस्विनी ।।३८।।

चार्वङ्गी चंचला  लोल-जिह्वा  चारु-चरित्रिणी ।
त्रपा त्रपा-वती लज्जा निर्लज्जा ह्नीं रजोवती ।।३९।।

सत्व-वती  धर्म-निष्ठा  श्रेष्ठा  निष्ठुर-वादिनी ।
गरिष्ठा दुष्ट-संहत्री  विशिष्टा  श्रेयसी  घृणा ।।४०।।

भीमा भयानका भीमा-नादिनी भी:  प्रभावती ।
वागीश्वरी श्रीर्यमुना यज्ञ-कत्र्री   यजु:-प्रिया ।।४१।।

ऋक्-सामाथर्व-निलया  रागिणी  शोभन-स्वरा ।
कल-कण्ठी कम्बु-कण्ठी वेणु-वीणा-परायणा ।।४२।।

वशिनी वैष्णवी  स्वच्छा धात्री त्रि-जगदीश्वरी ।
मधुमती कुण्डलिनी शक्ति: ऋद्धि: सिद्धि: शुचि-स्मिता ।।४३।।

रम्भोवैशी  रती  रामा  रोहिणी  रेवती  मघा ।
शङ्खिनी चक्रिणी कृष्णा  गदिनी पद्मनी  तथा ।।४४।।

शूलिनी परिघास्त्रा  च  पाशिनी  शाङ्र्ग-पाणिनी ।
पिनाक-धारिणी  धूम्रा  सुरभि  वन-मालिनी ।।४५।।

रथिनी समर-प्रीता  च  वेगिनी  रण-पण्डिता ।
जटिनी वङ्किाणी नीला लावण्याम्बुधि-चन्द्रिका ।।४६।।

बलि-प्रिया महा-पूज्या  पूर्णा  दैत्येन्द्र-मन्थिनी ।
महिषासुर-संहन्त्री  वासिनी  रक्त-दन्तिका ।।४७।।

रक्तपा   रुधिराक्ताङ्गी   रक्त-खर्पर-हस्तिनी  ।
रक्त-प्रिया   माँस - रुधिरासवासक्त-मानसा ।।४८।।

गलच्छोेणित-मुण्डालि-कण्ठ-माला-विभूषणा ।
शवासना चितान्त:स्था  माहेशी  वृष-वाहिनी ।।४९।।

व्याघ्र-त्वगम्बरा  चीर-चेलिनी सिंह-वाहिनी ।
वाम-देवी  महा-देवी  गौरी  सर्वज्ञ-भाविनी ।।५०।।

बालिका तरुणी  वृद्धा  वृद्ध-माता  जरातुरा  ।
सुभ्रुर्विलासिनी  ब्रह्म-वादिनि  ब्रह्माणी  मही ।।५१।।

स्वप्नावती  चित्र-लेखा  लोपा-मुद्रा सुरेश्वरी  ।
अमोघाऽरुन्धती  तीक्ष्णा  भोगवत्यनुवादिनी ।।५२।।

मन्दाकिनी  मन्द-हासा  ज्वालामुख्यसुरान्तका ।
मानदा मानिनी  मान्या  माननीया मदोद्धता ।।५३।।

मदिरा  मदिरोन्मादा  मेध्या  नव्या  प्रसादिनी ।
सुमध्यानन्त-गुणिनी    सर्व-लोकोत्तमोत्तमा ।।५४।।

जयदा जित्वरा  जेत्री   जयश्रीर्जय-शालिनी ।
सुखदा शुभदा  सत्या  सभा-संक्षोभ-कारिणी ।।५५।।

शिव-दूती   भूति-मती    विभूतिर्भीषणानना ।
कौमारी कुलजा कुन्ती कुल-स्त्री कुल-पालिका ।।५६।।

कीर्तिर्यशस्विनी भूषां  भूष्या  भूत-पति-प्रिया ।
सगुणा-निर्गुणा  धृष्ठा  कला-काष्ठा प्रतिष्ठिता ।।५७।।

धनिष्ठा धनदा धन्या  वसुधा   स्व-प्रकाशिनी ।
उर्वी गुर्वी गुरु-श्रेष्ठा  सगुणा  त्रिगुणात्मिका ।।५८।।

महा-कुलीना निष्कामा सकामा  काम-जीवना ।
काम-देव-कला  रामाभिरामा शिव-नर्तकी ।।५९।।

चिन्तामणि:  कल्पलता  जाग्रती  दीन-वत्सला ।
कार्तिकी कृत्तिका कृत्या अयोेध्या विषमा समा ।।६०।।

सुमंत्रा मंत्रिणी घूर्णा  ह्लादिनी क्लेश-नाशिनी ।
त्रैलोक्य-जननी हृष्टा  निर्मांसा  मनोरूपिणी ।।६१।।

तडाग-निम्न-जठरा  शुष्क-मांसास्थि-मालिनी ।
अवन्ती  मथुरा  माया त्रैलोक्य-पावनीश्वरी ।।६२।।

व्यक्ताव्यक्तानेक-मूर्ति:  शर्वरी भीम-नादिनी ।
क्षेमज्र्री  शंकरी च सर्व- सम्मोह-कारिणी ।।६३।।

ऊध्र्व-तेजस्विनी  क्लिन्न  महा-तेजस्विनी तथा ।
अद्वैत  भोगिनी  पूज्या  युवती  सर्व-मङ्गला ।।६४।।

सर्व-प्रियंकरी  भोग्या  धरणी पिशिताशना ।
भयंकरी   पाप-हरा  निष्कलंका  वशंकरी ।।६५।।

आशा तृष्णा चन्द्र-कला निद्रिका वायु-वेगिनी ।
सहस्र-सूर्य  संकाशा  चन्द्र-कोटि-सम-प्रभा ।।६६।।

वह्नि-मण्डल-मध्यस्था   सर्व-तत्त्व-प्रतिष्ठिता ।
सर्वाचार-वती    सर्व-देव - कन्याधिदेवता ।।६७।।

दक्ष-कन्या  दक्ष-यज्ञ  नाशिनी  दुर्ग  तारिणी ।
इज्या पूज्या विभीर्भूति:  सत्कीर्तिब्र्रह्म-रूपिणी ।।६८।।

रम्भीश्चतुरा   राका   जयन्ती  करुणा कुहु: ।
मनस्विनी देव-माता   यशस्या ब्रह्म-चारिणी ।।६९।।

ऋद्धिदा  वृद्धिदा वृद्धि: सर्वाद्या सर्व-दायिनी ।
आधार-रूपिणी  ध्येया  मूलाधार-निवासिनी ।।७०।।

आज्ञा  प्रज्ञा-पूर्ण-मनाश्चन्द्र-मुख्यानुवूâलिनी ।
वावदूका निम्न-नाभि: सत्या सन्ध्या दृढ़-व्रता ।।७१।।

आन्वीक्षिकी  दंड-नीतिस्त्रयी  त्रि-दिव-सुन्दरी ।
ज्वलिनी ज्वालिनी शैल-तनया विन्ध्य-वासिनी ।।७२।।

अमेया  खेचरी  धैर्या    तुरीया  विमलातुरा ।
प्रगल्भा वारुणीच्छाया शशिनी विस्पुâलिङ्गिनी ।।७३।।

भुक्ति सिद्धि सदा प्राप्ति: प्राकम्या महिमाणिमा ।
इच्छा-सिद्धिर्विसिद्धा च वशित्वीध्र्व-निवासिनी ।।७४।।

लघिमा  चैव  गायित्री  सावित्री  भुवनेश्वरी ।
मनोहरा  चिता  दिव्या  देव्युदारा  मनोरमा ।।७५।।

पिंगला  कपिला  जिह्वा-रसज्ञा  रसिका रसा ।
सुषुम्नेडा  भोगवती  गान्धारी   नरकान्तका ।।७६।।

पाञ्चाली  रुक्मिणी  राधाराध्या भीमाधिराधिका ।
अमृता  तुलसी  वृन्दा  वैâटभी   कपटेश्वरी ।।७७।।

उग्र-चण्डेश्वरी   वीर-जननी    वीर-सुन्दरी  ।
उग्र-तारा  यशोदाख्या  देवकी  देव-मानिता ।।७८।।

निरन्जना चित्र-देवी   क्रोधिनी कुल-दीपिका ।
कुल-वागीश्वरी वाणी  मातृका द्राविणी द्रवा ।।७९।।

योगेश्वरी-महा-मारी भ्रामरी  विन्दु-रूपिणी ।
दूती प्राणेश्वरी   गुप्ता  बहुला चामरी-प्रभा ।।८०।।

कुब्जिका ज्ञानिनी  ज्येष्ठा  भुशुंडी प्रकटा तिथि: ।
द्रविणी गोपिनी माया काम-बीजेश्वरी क्रिया ।।८१।।

शांभवी  केकरा  मेना मूषलास्त्रा  तिलोत्तमा ।
अमेय-विक्रमा व्रूâरा सम्पत्-शाला त्रिलोचना ।।८२।।

सुस्थी  हव्य-वहा  प्रीतिरुष्मा  धूम्रार्चिरङ्गदा  ।
तपिनी  तापिनी  विश्वा भोगदा  धारिणी धरा ।।८३।।

त्रिखंडा बोधिनी वश्या सकला शब्द-रूपिणी ।
बीज-रूपा  महा-मुद्रा योगिनी  योनि-रूपिणी ।।८४।।

अनङ्ग - मदनानङ्ग  - लेखनङ्ग - कुशेश्वरी ।
अनङ्ग-मालिनि-कामेशी  देवि   सर्वार्थ-साधिका ।।८५।।

सर्व-मन्त्र-मयी     मोहिन्यरुणानङ्ग-मोहिनी ।
अनङ्ग-कुसुमानङ्ग-मेखलानङ्ग - रूपिणी ।।८६।।

वङ्कोश्वरी  च  जयिनी    सर्व-द्वन्द्व-क्षयज्र्री  ।
षडङ्ग-युवती  योग-युक्ता  ज्वालांशु-मालिनी ।।८७।।

दुराशया   दुराधारा   दुर्जया   दुर्ग-रूपिणी ।
दुरन्ता   दुष्कृति-हरा   दुध्र्येया   दुरतिक्रमा ।।८८।।

हंसेश्वरी   त्रिकोणस्था   शाकम्भर्यनुकम्पिनी ।
त्रिकोण-निलया   नित्या  परमामृत-रञ्जिता ।।८९।।

महा-विद्येश्वरी  श्वेता  भेरुण्डा  कुल-सुन्दरी  ।
त्वरिता भक्त-संसक्ता   भक्ति-वश्या सनातनी ।।९०।।

भक्तानन्द-मयी भक्ति-भाविका भक्ति-शज्र्री ।
सर्व-सौन्दर्य-निलया सर्व-सौभाग्य-शालिनी ।।९१।।

सर्व-सौभाग्य-भवना सर्व सौख्य-निरूपिणी ।
कुमारी-पूजन-रता    कुमारी-व्रत-चारिणी ।।९२।।

कुमारी-भक्ति-सुखिनी  कुमारी-रूप-धारिणी  ।
कुमारी-पूजक-प्रीता कुमारी प्रीतिदा  प्रिया ।।९३।।

कुमारी-सेवकासंगा     कुमारी-सेवकालया ।
आनन्द-भैरवी बाला  भैरवी  वटुक-भैरवी ।।९४।।

श्मशान-भैरवी   काल-भैरवी   पुर-भैरवी ।
महा-भैरव-पत्नी    च    परमानन्द-भैरवी ।।९५।।

सुधानन्द-भैरवी    च    उन्मादानन्द-भैरवी ।
मुक्तानन्द-भैरवी   च   तथा  तरुण-भैरवी ।।९६।।

ज्ञानानन्द-भैरवी    च    अमृतानन्द-भैरवी ।
महा-भयज्र्री   तीव्रा  तीव्र-वेगा तपस्विनी ।।९७।।

त्रिपुरा   परमेशानी   सुन्दरी    पुर-सुन्दरी  ।
त्रिपुरेशी  पञ्च-दशी  पञ्चमी   पुर-वासिनी ।।९८।।

महा-सप्त-दशी  चैव  षोडशी    त्रिपुरेश्वरी ।
महांकुश-स्वरूपा  च  महा-चव्रेâश्वरी  तथा ।।९९।।
नव-चव्रेâश्वरी  चक्र-ईश्वरी त्रिपुर-मालिनी ।
राज-राजेश्वरी   धीरा   महा-त्रिपुर-सुन्दरी  ।।१००।।

सिन्दूर-पूर-रुचिरा     श्रीमत्त्रिपुर-सुन्दरी  ।
सर्वांग-सुन्दरी   रक्ता  रक्त-वस्त्रोत्तरीयिणी ।।१०१।।

जवा-यावक-सिन्दूर -रक्त-चन्दन-धारिणी ।
त्रिकूटस्था  पञ्च-कूटा सर्व-वूâट-शरीरिणी ।।१०२।।

चामरी   बाल-कुटिल-निर्मल-श्याम-केशिनी ।
वङ्का-मौक्तिक-रत्नाढ्या-किरीट-मुकुटोज्ज्वला ।।१०३।।

रत्न-कुण्डल-संसक्त-स्फुरद्-गण्ड-मनोरमा ।
कुञ्जरेश्वर-कुम्भोत्थ-मुक्ता-रञ्जित-नासिका ।।१०४।।

मुक्ता-विद्रुम-माणिक्य-हाराढ्य-स्तन-मण्डला ।
सूर्य-कान्तेन्दु-कान्ताढ्य-कान्ता-कण्ठ-भूषणा      ।।१०५।।

वीजपूर-स्फुरद्-वीज -दन्त - पंक्तिरनुत्तमा ।
काम-कोदण्डकाभुग्न-भ्रू-कटाक्ष-प्रवर्षिणी  ।।१०६।।

मातंग-कुम्भ-वक्षोजा  लसत्कोक-नदेक्षणा ।
मनोज्ञ-शुष्कुली-कर्णा हंसी-गति-विडम्बिनी ।।१०७।।

पद्म-रागांगदा-ज्योतिर्दोश्चतुष्क-प्रकाशिनी ।
नाना-मणि-परिस्फूर्जच्दृद्ध-कांचन-वंâकणा ।।१०८।।

नागेन्द्र-दन्त-निर्माण-वलयांचित-पाणिनी ।
अंगुरीयक-चित्रांगी विचित्र-क्षुद्र-घण्टिका ।।१०९।।
पट्टाम्बर-परीधाना   कल-मञ्जीर-शिंजिनी  ।
कर्पूरागरु-कस्तूरी-कुंकुम-द्रव-लेपिता ।।११०।।

विचित्र-रत्न-पृथिवी-कल्प-शाखि-तल-स्थिता ।
रत्न-द्वीप-स्पुâरद्-रक्त-सिंहासन-विलासिनी ।।१११।।

षट्-चक्र-भेदन-करी     परमानन्द-रूपिणी  ।
सहस्र-दल - पद्यान्तश्चन्द्र - मण्डल-वर्तिनी ।।११२।।

ब्रह्म-रूप-शिव-क्रोड-नाना-सुख-विलासिनी ।
हर-विष्णु-विरंचीन्द्र-ग्रह - नायक-सेविता ।।११३।।

शिवा शैवा च रुद्राणी तथैव शिव-वादिनी  ।
मातंगिनी  श्रीमती  च  तथैवानन्द-मेखला ।।११४।।

डाकिनी  योगिनी  चैव  तथोपयोगिनी मता ।
माहेश्वरी वैष्णवी च  भ्रामरी  शिव-रूपिणी ।।११५।।

अलम्बुषा  वेग-वती  क्रोध-रूपा  सु-मेखला ।
गान्धारी  हस्ति-जिह्वा च इडा चैव शुभज्र्री ।।११६।।

पिंगला ब्रह्म-सूत्री च सुषुम्णा चैव  गन्धिनी ।
आत्म-योनिब्र्रह्म-योनिर्जगद-योनिरयोनिजा  ।।११७।।

भग-रूपा भग-स्थात्री  भगनी भग-रूपिणी ।
भगात्मिका भगाधार-रूपिणी  भग-मालिनी ।।११८।।

लिंगाख्या चैव लिंगेशी  त्रिपुरा-भैरवी तथा ।
लिंग-गीति: सुगीतिश्च लिंगस्था लिंग-रूप-धृव्â ।।११९।।
लिंग-माना लिंग-भवा लिंग-लिंगा च पार्वती ।
भगवती कौशिकी   च प्रेमा  चैव प्रियंवदा ।।१२०।।

गृध्र-रूपा शिवा-रूपा चक्रिणी चक्र-रूप-धृव्â   
लिंगाभिधायिनी लिंग-प्रिया लिंग-निवासिनी  ।।१२१।।

लिंगस्था लिंगनी लिंग-रूपिणी लिंग-सुन्दरी  ।
लिंग-गीतिमहा-प्रीता   भग-गीतिर्महा-सुखा ।।१२२।।

लिंग-नाम-सदानंदा   भग-नाम सदा-रति:  ।
लिंग-माला-वंâठ-भूषा  भग-माला-विभूषणा ।।१२३।।

भग-लिंगामृत-प्रीता   भग-लिंगामृतात्मिका ।
भग-लिंगार्चन-प्रीता  भग-लिंग-स्वरूपिणी  ।।१२४।।

भग-लिंग-स्वरूपा  च  भग-लिंग-सुखावहा ।
स्वयम्भू-कुसुम-प्रीता    स्वयम्भू-कुसुमार्चिता ।।१२५।।

स्वयम्भू-पुष्प-प्राणा स्वयम्भू-कुसुमोत्थिता ।
स्वयम्भू-कुसुम-स्नाता  स्वयम्भू-पुष्प-तर्पिता ।।१२६।।

स्वयम्भू-पुष्प-घटिता  स्वयम्भू-पुष्प-धारिणी ।
स्वयम्भू-पुष्प-तिलका स्वयम्भू-पुष्प-चर्चिता ।।१२७।।

स्वयम्भू-पुष्प-निरता    स्वयम्भू-कुसुम-ग्रहा ।
स्वयम्भू-पुष्प-यज्ञांगा  स्वयम्भूकुसुमात्मिका ।।१२८।।

स्वयम्भू-पुष्प-निचिता  स्वयम्भू-कुसुम-प्रिया ।
स्वयम्भू-कुसुमादान-लालसोन्मत्त - मानसा ।।१२९।।
स्वयम्भू-कुसुमानन्द-लहरी-स्निग्ध   देहिनी  ।
स्वयम्भू-कुसुमाधारा  स्वयम्भू-वुुâसुमा-कला ।।१३०।।

स्वयम्भू-पुष्प-निलया स्वयम्भू-पुष्प-वासिनी ।
स्वयम्भू-कुसुम-स्निग्धा स्वयम्भू-कुसुमात्मिका ।।१३१।।

स्वयम्भू-पुष्प-कारिणी स्वयम्भू-पुष्प-पाणिका ।
स्वयम्भू-कुसुम-ध्याना स्वयम्भू-कुसुम-प्रभा ।।१३२।।

स्वयम्भू-कुसुम-ज्ञाना स्वयम्भू-पुष्प-भोगिनी ।
स्वयम्भू-कुसुमोल्लास स्वयम्भू-पुष्प-वर्षिणी  ।।१३३।।

स्वयम्भू-कुसुमोत्साहा स्वयम्भू-पुष्प-रूपिणी  ।
स्वयम्भू-कुसुमोन्मादा  स्वयम्भू पुष्प-सुन्दरी ।।१३४।।
स्वयम्भू-कुसुमाराध्या  स्वयम्भू-कुसुमोद्भवा ।
स्वयम्भू-कुसुम-व्यग्रा स्वयम्भू-पुष्प-पूर्णिता ।।१३५।।
स्वयम्भू-पूजक-प्रज्ञा  स्वयम्भू-होतृ-मातृका  ।
स्वयम्भू-दातृ-रक्षित्री स्वयम्भू-रक्त-तारिका ।।१३६।।
स्वयम्भू-पूजक-ग्रस्ता  स्वयम्भू-पूजक-प्रिया ।
स्वयम्भू-वन्दकाधारा स्वयम्भू-निन्दकान्तका ।।१३७।।
स्वयम्भू-प्रद-सर्वस्वा  स्वयम्भू-प्रद-पुत्रिणी  ।
स्वम्भू-प्रद-सस्मेरा  स्वयम्भू-प्रद-शरीरिणी ।।१३८।।
सर्व-कालोद्भव-प्रीता  सर्व-कालोद्भवात्मिका ।
सर्व-कालोद्भवोद्भावा  सर्व-कालोद्भवोद्भवा ।।१३९।।
कुण्ड-पुष्प-सदा-प्रीतिर्गोल-पुष्प-सदा-रति:  ।
कुण्ड-गोलोद्भव-प्राणा कुण्ड-गोलोद्भवात्मिका ।।१४०।।
स्वयम्भुवा शिवा धात्री पावनी लोक-पावनी ।
कीर्तिर्यशस्विनी मेधा विमेधा  शुक्र-सुन्दरी ।।१४१।।
अश्विनी कृत्तिका पुष्या तैजस्का चन्द्र-मण्डला  ।
सूक्ष्माऽसूक्ष्मा  वलाका च वरदा भय-नाशिनी  ।।१४२।।
वरदाऽभयदा  चैव  मुक्ति-बन्ध-विनाशिनी ।
कामुका कामदा कान्ता कामाख्या कुल-सुन्दरी ।।१४३।।
दुःखदा  सुखदा मोक्षा मोक्षदार्थ-प्रकाशिनी  ।
दुष्टादुष्ट-मतिश्चैव   सर्व-कार्य-विनाशिनी ।।१४४।।
शुक्राधारा शुक्र-रूपा-शुक्र-सिन्धु-निवासिनी ।
शुक्रालया शुक्र-भोग्या  शुक्र-पूजा-सदा-रति:।।१४५।।
शुक्र-पूज्या-शुक्र-होम-सन्तुष्टा शुक्र-वत्सला ।
शुक्र-मूत्र्ति: शुक्र-देहा शुक्र-पूजक-पुत्रिणी ।।१४६।।
शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्र-संस्पृहा शुक्र-सुन्दरी ।
शुक्र-स्नाता शुक्र-करी शुक्र-सेव्याति-शुक्रिणी ।।१४७।।
महा-शुक्रा शुक्र-भवा शुक्र-वृष्टि-विधायिनी ।
शुक्राभिधेया शुक्रार्हा  शुक्र-वन्दक-वन्दिता ।।१४८।।
शुक्रानन्द-करी  शुक्र-सदानन्दाभिधायिका  ।
शुक्रोत्सवा  सदा-शुक्र-पूर्णा  शुक्र-मनोरमा ।।१४९।।
शुक्र-पूजक-सर्वस्वा  शुक्र-निन्दक-नाशिनी ।
शुक्रात्मिका शुक्र-सम्पत् शुक्राकर्षण-कारिणी  ।।१५०।।
शारदा साधक-प्राणा   साधकासक्त-रक्तपा ।
साधकानन्द-सन्तोषा   साधकानन्द-कारिणी ।।१५१।।

आत्म-विद्या ब्रह्म-विद्या पर ब्रह्म स्वरूपिणी ।
सर्व-वर्ण-मयी  देवी जप-माला-विधायिनी  ।।

योनिस्तोत्रम्
ॐभग-रूपा जगन्माता सृष्टि-स्थिति-लयान्विता ।
दशविद्या - स्वरूपात्मा  योनिर्मां   पातु  सर्वदा ।।१।।

कोण-त्रय-युता  देवि   स्तुति-निन्दा-विवर्जिता ।
जगदानन्द-सम्भूता   योनिर्मां    पातु     सर्वदा ।।२।।

कात्र्रिकी - कुन्तलं  रूपं  योन्युपरि सुशोभितम् ।
भुक्ति-मुक्ति-प्रदा  योनि:  योनिर्मां  पातु  सर्वदा ।।३।।

वीर्यरूपा   शैलपुत्री    मध्यस्थाने    विराजिता ।
ब्रह्म-विष्णु-शिव  श्रेष्ठा  योनिर्मां  पातु  सर्वदा ।।४।।

योनिमध्ये   महाकाली   छिद्ररूपा   सुशोभना ।
सुखदा   मदनागारा   योनिर्मां    पातु   सर्वदा ।।५।।

काल्यादि-योगिनी-देवी   योनिकोणेषु  संस्थिता ।
मनोहरा  दुःख   लभ्या  योनिर्मां  पातु  सर्वदा ।।६।।

सदा शिवो मेरु-रूपो  योनिमध्ये  वसेत्  सदा ।
वैâवल्यदा   काममुक्ता   योनिर्मां  पातु   सर्वदा ।।७।।

सर्व-देव   स्तुता    योनि   सर्व-देव-प्रपूजिता ।
सर्व-प्रसवकत्र्री   त्वं   योनिर्मां   पातु   सर्वदा ।।८।।

सर्व-तीर्थ-मयी  योनि:  सर्व-पाप   प्रणाशिनी ।
सर्वगेहे  स्थिता  योनि:  योनिर्मां  पातु   सर्वदा ।।९।।

मुक्तिदा  धनदा  देवी  सुखदा  कीर्तिदा  तथा ।
आरोग्यदा    वीर-रता   पञ्च-तत्व-युता  सदा ।।१०।।

योनिस्तोत्रमिदं प्रोत्तंâ  य:  पठेत्   योनि-सन्निधौ ।
शक्तिरूपा  महादेवी  तस्य  गेहे   सदा  स्थिता ।।११।।

10 comments:

  1. path kerne ka vidhi vidhan keya hai kirpya betyan

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  2. पवित्र सम्भोग का उचित अर्थ आज ज्ञात हुआ ! बहुत बहुत साधुवाद

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  3. मानव जीवन का परमात्मा से मिलने का मार्गदर्शन देने के लिए आपको कोटिशः नमन् करता हूँ

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  4. कृपया बगलामुखी गुह्य-तंत्रोपासना के बारे में बताएं

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  5. Do u hv shamshanalya vasini stotra.kindly mail at shyam666578@gmail.com. Aabhar or pranaam.

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  6. Do u hv shamshanalya vasini stotra.kindly mail at shyam666578@gmail.com. Aabhar or pranaam.

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  7. Pranaam .kya aap k pass kali shamshanalya vasini stotra h jo ki Shankaracharya ji dwara rachit h.?.yadi h to mail pr jawab de.aap ka dhanyawad.

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  8. Pranaam .kya aap k pass kali shamshanalya vasini stotra h jo ki Shankaracharya ji dwara rachit h.?.yadi h to mail pr jawab de.aap ka dhanyawad.

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  9. Pranaam .kya aap k pass kali shamshanalya vasini stotra h jo ki Shankaracharya ji dwara rachit h.?.yadi h to mail pr jawab de.aap ka dhanyawad.

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  10. Pranaam .kya aap k pass kali shamshanalya vasini stotra h jo ki Shankaracharya ji dwara rachit h.?.yadi h to mail pr jawab de.aap ka dhanyawad.

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